भागीरथपुरा में दूषित पानी से उपजी मौतों की श्रृंखला थमने का नाम नहीं ले रही है। मंगलवार को दो और लोगों की जान चली जाने के बाद इस जल त्रासदी में मृतकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई है। नलों से आ रहा गंदा पानी अब सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि सीधे लोगों की जिंदगी छीन रहा है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन अब भी वास्तविक कारणों को स्वीकार करने से बचता नजर आ रहा है।
इलाके में उल्टी-दस्त और संक्रमण के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की लंबी कतारें हैं, कई जगह बेड तक उपलब्ध नहीं हैं। परिजन साफ तौर पर दूषित पानी को मौतों का जिम्मेदार बता रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर हर मौत को अलग-अलग कारणों से जोड़कर पल्ला झाड़ने की कोशिश की जा रही है।
इस त्रासदी में श्रावण नथ्थु खुपराव की मौत भी शामिल हो गई है। 25 दिसंबर को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कुछ समय के लिए हालत में सुधार हुआ, लेकिन 29 दिसंबर को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनका अंतिम संस्कार महाराष्ट्र के बुलढ़ाना जिले के सेलापुर गांव में किया गया। विडंबना यह है कि उनका परिवार इंदौर में पानी की टंकी से जुड़े काम के कारण रह रहा था, फिर भी दूषित पानी ने ही उनकी जान ले ली।
वहीं, 47 वर्षीय रामकली पत्नी जगदीश की मौत ने भी प्रशासन के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 28 दिसंबर को अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि रामकली को पहले कोई गंभीर बीमारी नहीं थी।
भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में हालात भयावह हैं। लगभग हर घर में बीमार मरीज मिल रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब भी हालात को सामान्य बताने में जुटे हैं। सवाल यह है कि कितनी और मौतों के बाद सिस्टम जागेगा?
भागीरथपुरा में बहता दूषित पानी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता की कड़वी सच्चाई बन चुका है।








