ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं… ये उस राज्य की कहानी है, जो हर गुजरते मिनट के साथ और भारी होता जा रहा है।
मध्य प्रदेश में मोहन सरकार हर मिनट करीब ₹13.6 लाख का नया कर्ज उठा रही है।
और उसी एक मिनट में, करीब ₹6 लाख सिर्फ ब्याज चुकाने में निकल जा रहे हैं।
यानी विकास से पहले कर्ज, और कर्ज से पहले ब्याज।
आज हालात ये हैं कि मध्य प्रदेश का कुल कर्ज ₹4.5 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है।
इसका मतलब—राज्य का हर नागरिक, चाहे वो किसान हो, मजदूर हो या छात्र—औसतन ₹60,000 के कर्ज का बोझ ढो रहा है।
9 महीनों में 53 हजार करोड़… सवालों के घेरे में सरकार
आंकड़े बताते हैं कि 1 अप्रैल 2025 से 31 दिसंबर 2025 के बीच, महज 9 महीनों में सरकार ने ₹53,100 करोड़ का नया कर्ज लिया।
वित्त विभाग के ये आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि खजाने की हालत क्या है।
सवाल ये नहीं कि कर्ज लिया गया,
सवाल ये है कि कर्ज गया कहां?
क्या इससे स्कूल बेहतर हुए?
क्या अस्पताल मजबूत हुए?
या फिर ये रकम सिर्फ फाइलों और योजनाओं के नाम पर सिमट कर रह गई?
हर गुजरता मिनट, हर बढ़ता रुपया…
मध्य प्रदेश के भविष्य पर एक और सवाल छोड़ जाता है।
अपना मध्य प्रदेश है…
लेकिन क्या ये कर्ज में डूबता मध्य प्रदेश बनता जा रहा है?







