मध्यप्रदेश की सियासत से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की जोड़ी ने आगामी विधानसभा चुनाव से ढाई साल पहले ही निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में नियुक्तियों का जो सिलसिला शुरू किया था, उस पर अब फिलहाल विराम लग गया है। सत्ता और संगठन के गलियारों से संकेत मिले हैं कि अब नियुक्तियों की अगली सूची के लिए नेताओं को थोड़ा और इंतजार करना होगा। गौरतलब है कि अब तक प्रदेश के करीब 70 दिग्गजों को विभिन्न बोर्ड, आयोग और प्राधिकरणों में जिम्मेदारी सौंपकर ‘एडजस्ट’ किया जा चुका है, लेकिन शेष रिक्त पदों पर अब मंथन का दौर लंबा खिंच सकता है।
इस ब्रेक के पीछे का कारण संगठन की नई रणनीति मानी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के हालिया बयानों ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब परफॉर्मेंस और क्षेत्रीय समीकरणों को और बारीकी से परखना चाहती है। हालांकि, इस बीच बाल अधिकार संरक्षण आयोग जैसे महत्वपूर्ण निकायों में डॉ. निवेदिता शर्मा की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन सदस्यों के पदों पर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। चर्चा है कि सीमा सिंह जादौन, सोनम निनामा, अर्चना गुप्ता और मोनिका बट्टी के नाम पैनल में लगभग तय हैं, बस आधिकारिक मुहर लगना शेष है।
इंदौर-भोपाल प्राधिकरणों में फंसा पेच: वायरल ऑडियो और गुटबाजी ने बिगाड़ा समीकरण
ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन जैसे शहरों के विकास प्राधिकरणों में तो अध्यक्षों ने कार्यभार संभाल लिया है, लेकिन सूबे के दो सबसे महत्वपूर्ण शहरों—भोपाल और इंदौर—में नियुक्तियों की फाइलें फिलहाल बंद नजर आ रही हैं। खजुराहो और ओरछा विकास प्राधिकरणों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। इन हाई-प्रोफाइल प्राधिकरणों में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त और गुटीय संतुलन बैठाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। विशेष रूप से राजधानी भोपाल में बीडीए (BDA) की रेस में सबसे आगे चल रहे चेतन सिंह के एक वायरल ऑडियो ने पूरे मामले को गरमा दिया है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस ऑडियो के बाद चेतन सिंह की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश संगठन के पास उनके खिलाफ ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ की गंभीर शिकायतें पहुंची हैं, जिसने उनकी दावेदारी पर सवालिया निशान लगा दिया है। यही वजह है कि विवादों से बचने के लिए संगठन अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। जब तक इन शिकायतों का निपटारा और स्थानीय समीकरणों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक इंदौर-भोपाल के प्राधिकरणों में नियुक्तियों की राह आसान नजर नहीं आती। फिलहाल, कतार में खड़े बाकी नेताओं के लिए यह ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति है।







