मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था को झकझोर देने वाला बड़ा खुलासा सामने आया है। यहां ऐसे कथित डॉक्टरों का नेटवर्क बेनकाब हुआ है, जिन्होंने फर्जी डिग्री, फर्जी मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन और दूसरे डॉक्टरों के पंजीयन नंबर के सहारे सरकारी नौकरी हासिल कर ली। हैरानी की बात यह है कि जिन दस्तावेजों की एक सामान्य ऑनलाइन जांच में सच्चाई सामने आ सकती थी, उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और जिला स्तर के अधिकारियों ने सत्यापित मानकर नियुक्ति दे दी।
जनवरी 2026 से ये लोग संजीवनी क्लीनिकों में मरीजों का इलाज करते रहे और स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बने रहे। जांच में सामने आया कि किसी ने दूसरे डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर इस्तेमाल किया, तो किसी का पंजीयन नंबर मेडिकल काउंसिल के रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं था। इसके बावजूद सरकारी तंत्र की निगरानी व्यवस्था इस गड़बड़ी को पकड़ नहीं सकी।
मामला उजागर होने के बाद भोपाल की चूनाभट्टी पुलिस ने 9 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। आरोपियों में डॉ. आकाश चंदेलकर, डॉ. मोहर सिंह, डॉ. कमल किशोर, डॉ. मोनिका, डॉ. हारून, डॉ. शांति, डॉ. सोनम, डॉ. बुद्धमान और डॉ. पवन के नाम शामिल हैं। अब सवाल यह है कि आखिर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी पाने वाले इन लोगों को नियुक्ति किसने दी और मरीजों की जान से हुए इस खिलवाड़ की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?







