छिंदवाड़ा से सामने आई यह कहानी कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि समाज की उस गंदी सच्चाई का आईना है, जहां इंसान की मजबूरी को बाजार में नीलाम कर दिया जाता है। 42 साल का मधु विश्वकर्मा अकेला, टूटा हुआ और भरोसे की तलाश में ठग गिरोह की सबसे आसान शिकार बन गया।
ठगों ने पहले दर्द को पहचाना…फिर उसी पर वार किया। “तुम अकेले रहते हो… दूसरी पत्नी रख लो…यही वो जहर था, जिसे मीठे बोलों में घोलकर मधु को पिला दिया गया। गिरोह ने संध्या नाम की महिला को आगे किया जो पत्नी नहीं, बल्कि पूरी साजिश का जिंदा चेहरा थी। संध्या घर आई। रसोई में गई। कमरे में रही। और मधु को लगा—अब अकेलापन खत्म हुआ। लेकिन जब-जब मधु ने कोर्ट मैरिज की बात की, तब-तब बहानेबाज़ी हुई। तारीख टली, बात बदली… और भरोसा और गहरा होता गया। मधु ने गहने बनवाए, जिम्मेदारी निभाई, एक पति बनने का सपना देखा।
फिर आया वो दिन… जिस दिन “छोटा भाई” कहकर असली प्रेमी को घर बुलाया गया। और मौका मिलते ही, नई बाइक गायब, जेवर साफ,
मोबाइल उठा लिया, यहां तक कि घर का राशन भी नहीं छोड़ा। पीछे छूट गया तो सिर्फ एक आदमी, लुटा हुआ, ठगा हुआ, और शर्म से झुका हुआ।
पुलिस ने मामले का खुलासा किया है। महिला समेत चार आरोपी जेल में हैं, लेकिन असली मास्टरमाइंड महिला का प्रेमी अब भी फरार है। सवाल यह नहीं कि अपराध हुआ… सवाल यह है कि ऐसे गिरोह कब तक मजबूरी को हथियार बनाते रहेंगे? पहली पत्नी की मौत के बाद मधु ने दोबारा जीवन बसाने की सोची थी। लेकिन यहां तो शादी नहीं, सीधा कत्ल हुआ है भरोसे का।
यह कहानी चेतावनी है कि जब भी कोई आपके दर्द को बहुत अच्छे से समझने लगे, तो सावधान हो जाइए… क्योंकि ठग हमेशा वहीं वार करते हैं,
जहां इंसान सबसे कमजोर होता है।







