राजस्थान के कोटपूतली जिले में अरावली की पहाड़ियों पर विराजमान छापाला भैरूजी धाम इन दिनों भक्ति, उत्साह और तैयारियों के अद्भुत संगम का साक्षी बन रहा है। यहां लगने वाले प्रसिद्ध लक्खी मेले की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं और पूरे क्षेत्र में मानो भैरू बाबा की जय-जयकार गूंज रही है। गांव-गांव से लेकर दूर-दराज़ के राज्यों तक, श्रद्धालुओं में मेले को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
इस वर्ष मेले की भव्यता नए कीर्तिमान रचने जा रही है। भैरू बाबा को 651 क्विंटल चूरमे की महाप्रसादी का भोग लगाया जाएगा, जिसे तैयार करने में आधुनिक मशीनों के साथ पारंपरिक आस्था का अनोखा मेल देखने को मिल रहा है। तीन जेसीबी और थ्रेसर की मदद से लाखों श्रद्धालुओं के लिए चूरमा तैयार किया गया है। बाटियों की सिकाई के बाद उन्हें थ्रेसर में पीसकर चूरमे का विशाल पहाड़ खड़ा किया गया, जिसमें देसी घी, खांड, काजू, बादाम और किशमिश को जेसीबी से मिलाया गया नज़ारा देखने वालों के लिए यह अपने आप में चमत्कार से कम नहीं।
मेले में राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु बाबा के दरबार में हाजरी लगाएंगे। मन्नतें मांगेंगे, मत्था टेकेंगे और महाप्रसादी ग्रहण करेंगे। खास बात यह है कि पूरे मेले की व्यवस्थाएं स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ही संभाली जाती हैं। 5000 से अधिक वालंटियर दिन-रात सेवा में जुटे हुए हैं, जिनमें 3000 पुरुष कार्यकर्ता और 500 से अधिक महिलाएं व स्वयंसेवक शामिल हैं।
मेले का शुभारंभ शनिवार को होगा, लेकिन सुबह की शुरुआत होगी भव्य कलश यात्रा से। हजारों महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण कर विधि-विधान से इस यात्रा में शामिल होंगी। वहीं, श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा की तैयारी भी की जा रही है, जो इस आयोजन को और भी दिव्य बना देगी। मंदिर के चारों ओर कई किलोमीटर तक फैले क्षेत्र में मेले का आयोजन होगा।
एक महीने से चल रही महाप्रसादी की तैयारी के तहत 100 मीटर लंबे जगरे में 150 क्विंटल आटे की बाटियों की सिकाई की गई, जिसके लिए 450 क्विंटल गोबर के उपलों का उपयोग हुआ। इसके अलावा 100 क्विंटल सूजी, 35 क्विंटल देसी घी, 130 क्विंटल खांड, 10 क्विंटल मावा, 100 क्विंटल दूध-आटा मिश्रण, 80 क्विंटल दूध-दही, दाल, मसाले और अन्य सामग्री जुटाई गई। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए 25 पानी के टैंकरों की व्यवस्था भी की गई है।
छापाला भैरूजी का यह लक्खी मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था, सेवा और समर्पण का ऐसा उदाहरण है, जहां परंपरा और आधुनिकता मिलकर भक्ति का इतिहास रच रही हैं।







