इंदौर में कानून की रखवाली करने वाली वर्दी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सवाल छोटे नहीं हैं, आरोप हल्के नहीं हैं और मौत… एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई एफआईआर, कोई डायरी, कोई सफाई मिटा नहीं सकती।
ब्राउन शुगर के नाम पर पकड़ा गया एक गंभीर रूप से बीमार युवक। जिला जेल की सलाखों के पीछे उसकी मौत। और अब जो परतें खुल रही हैं, वे पुलिसिया कार्रवाई नहीं बल्कि पुलिसिया बर्बरता की कहानी बयां कर रही हैं।
पीड़ित परिवार का दावा सीधा और बेहद गंभीर है। बिना एफआईआर घर से उठाया गया। अवैध वसूली की गई। और जब मामला नहीं बना, तो झूठा एनडीपीएस केस ठोक दिया गया। सवाल यह नहीं है कि युवक दोषी था या नहीं। सवाल यह है कि क्या पुलिस को कानून से ऊपर बैठने का लाइसेंस मिल गया है?
15 नवंबर 2024 की यह कहानी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता का पोस्टमार्टम है। जिस युवक को घर से उठाया गया, वह टीबी का मरीज था। इतना कमजोर कि उसका वजन सिर्फ 30 किलो रह गया था। डॉक्टर जवाब दे चुके थे। परिवार आखिरी उम्मीद के सहारे उसकी देखभाल कर रहा था। और तभी वर्दी आई… इलाज के लिए नहीं, हथकड़ी पहनाने के लिए।
बहन राधिका सोनी ने 23 मई 2025 को पुलिस कमिश्नर से गुहार लगाई। कानून की भाषा में नहीं, बल्कि एक बहन के टूटे हुए शब्दों में। लेकिन पुलिस महकमे में सन्नाटा रहा। शायद शिकायत भारी नहीं थी, या वर्दी बहुत ताकतवर।
जब पुलिस नहीं जागी, तो न्यायालय को जागना पड़ा। 8 जनवरी 2026 को जिला न्यायालय इंदौर में परिवाद पेश हुआ। और अब अदालत ने एमआईजी थाने के 9 पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए हैं।
शिकायत में जिन धाराओं का जिक्र है, वे मामूली नहीं हैं। भारतीय न्याय संहिता से लेकर एनडीपीएस एक्ट तक। सवाल यह है कि क्या ये धाराएं सिर्फ कागजों के लिए हैं, या वर्दी पहनने वालों पर भी लागू होती हैं?
यह मामला सिर्फ एक युवक की मौत का नहीं है। यह उस डर का है जो हर आम नागरिक के मन में बैठ चुका है। यह उस घमंड का है जो सत्ता की कुर्सी और वर्दी के साथ आ जाता है। और यह उस सिस्टम का है, जहां मरने वाला पहले अपराधी बना दिया जाता है और सच बाद में फाइलों में दबा दिया जाता है।







