क्या किसी महिला के साथ जबरन छेड़छाड़, उसके कपड़े उतारने की कोशिश और उसकी इच्छा के खिलाफ शारीरिक हरकत करना रेप की कोशिश माना जाएगा या नहीं? पटना हाईकोर्ट के एक फैसले ने इसी सवाल पर देशभर में नई बहस छेड़ दी है। आखिर कोर्ट ने आरोपी को क्यों बरी किया और इस फैसले का कानूनी मतलब क्या है… आइए जानते हैं।
बिहार के बांका जिले से जुड़े करीब 18 साल पुराने एक मामले में पटना हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिस पर कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज हो गई है।
मामला साल 2008 का है। आरोप था कि एक युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो पहुंची थी। शिकायत के मुताबिक स्टूडियो मालिक उसे फोटो खींचने के बहाने अंदर ले गया, दरवाजा बंद कर दिया और उसके साथ जबरदस्ती की। आरोप था कि उसने युवती की छाती दबाई, सलवार उतारने की कोशिश की और रेप करने की नीयत से अश्लील हरकतें कीं। युवती की चीख सुनकर उसके पिता पहुंचे, जिसके बाद आरोपी मौके से फरार हो गया।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास और बंधक बनाने का दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी। लेकिन आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अब हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरोपी की हरकतें अश्लील छेड़छाड़ और आपत्तिजनक व्यवहार तो हो सकती हैं, लेकिन इन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 376/511 के तहत रेप का प्रयास साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष रेप के प्रयास के लिए जरूरी कानूनी तत्वों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसी आधार पर आरोपी को रेप के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया गया।
हालांकि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने कथित हरकतों को सही ठहराया है। यह निर्णय मुख्य रूप से इस बात पर आधारित है कि कानून में “रेप का प्रयास” साबित करने के लिए किन परिस्थितियों और सबूतों की आवश्यकता होती है।
अब इस फैसले के बाद बड़ा सवाल यही है कि क्या मौजूदा कानूनी कसौटी महिलाओं के खिलाफ ऐसे मामलों में पर्याप्त है, या फिर कानून की व्याख्या को लेकर नई बहस शुरू होगी? इस फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों और महिला अधिकार संगठनों की प्रतिक्रियाओं पर भी पूरे देश की नजर बनी हुई है।







