इंदौर अब सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि सिस्टम की सड़ांध का प्रतीक बन चुका है। जिस पानी को जीवन कहा जाता है, वही पानी यहां मौत बांट रहा है और सरकार? वह अब भी आंकड़ों, फाइलों और बयानबाज़ी के पीछे छिपी बैठी है। दूषित पानी से दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन न तो जिम्मेदार अफसर कटघरे में हैं, न ही सत्ता के कानों पर जूं रेंग रही है। शायद सरकार को तब तक फर्क नहीं पड़ता, जब तक लाशें उनकी चौखट तक नहीं पहुंचतीं।
अब इस सरकारी संवेदनहीनता को राष्ट्रीय कटघरे में खड़ा करने आ रहे हैं कांग्रेस नेता राहुल गांधी। 17 जनवरी को वे इंदौर पहुंचकर उन परिवारों से मिलेंगे, जिनके घरों में नल से पानी नहीं, मौत बहकर आई है। यह कोई औपचारिक दौरा नहीं होगा यह सत्ता के चेहरे पर सीधा तमाचा होगा।
उसी दिन कांग्रेस प्रदेशभर में ब्लॉक स्तर पर सामूहिक उपवास करेगी। सवाल साफ है, जब जनता भूखी, बीमार और मर रही थी, तब सरकार क्या कर रही थी? सो रही थी या आंखें मूंदे बैठी थी? कांग्रेस संगठन प्रभारी संजय कामले ने साफ कर दिया है कि राहुल गांधी का दौरा एआईसीसी ने तय किया है और इसे जनआंदोलन का रूप दिया जाएगा। यानी अब यह मुद्दा दबेगा नहीं, दबाया जाएगा सरकार को।
याद दिला दें कि 11 जनवरी को कांग्रेस ने इंदौर में न्याय यात्रा निकाली थी। 200 किलोमीटर के दायरे से विधायक, पूर्व विधायक, प्रदेश पदाधिकारी और जिलाध्यक्ष जुटे। जितेंद्र पटवारी, उमंग सिंघार और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सरकार पर लापरवाही और अमानवीयता के तीखे आरोप लगाए। लेकिन सवाल अब भी वही है इतनी मौतों के बाद भी क्या कोई जवाबदेही तय होगी? क्या किसी की कुर्सी हिलेगी? या फिर यह भी एक और त्रासदी बनकर सरकारी फाइलों में दफन हो जाएगी?
17 जनवरी को इंदौर सिर्फ एक शहर नहीं बोलेगा
वह पूरे सिस्टम से पूछेगा:
पानी ज़हर था, या आपकी नीयत?







