देशभर में ‘इरादतन ऋण न चुकाने वालों’ यानी विलफुल डिफॉल्टरों की सूची में मध्य प्रदेश का नाम प्रमुखता से सामने आया है। संसद में पेश किए गए ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक देश के टॉप-10 डिफॉल्टरों में एमपी से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं, जिन्होंने बैंकों का हजारों करोड़ रुपए का कर्ज अब तक नहीं चुकाया है।
27 फरवरी 2026 तक के अपडेटेड डेटा के मुताबिक, केवल मध्य प्रदेश से जुड़ी शीर्ष दो कंपनियों पर ही ₹8,34,919 लाख यानी करीब 8,349 करोड़ रुपए का बकाया है। यह आंकड़ा न सिर्फ राज्य की वित्तीय साख पर सवाल उठाता है, बल्कि बैंकिंग सिस्टम के लिए भी बड़ी चिंता का विषय बन गया है।
संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि 2014 से 2025 के बीच विलफुल डिफॉल्टरों की संख्या और बकाया राशि लगातार बढ़ती रही है। इन कंपनियों पर आरोप है कि इनके पास कर्ज चुकाने की क्षमता होने के बावजूद इन्होंने जानबूझकर भुगतान नहीं किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों से बैंकिंग सेक्टर की सेहत पर गंभीर असर पड़ता है। इससे आम ग्राहकों के लिए लोन महंगे हो सकते हैं और वित्तीय संस्थानों का भरोसा भी कमजोर होता है।
सरकार और नियामक एजेंसियां अब इन डिफॉल्टरों पर सख्त कार्रवाई की बात कर रही हैं, जिसमें संपत्तियों की जब्ती, कानूनी कार्रवाई और रिकवरी प्रक्रिया को तेज करना शामिल है। हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि इतने बड़े स्तर पर बकाया होने के बावजूद वसूली की रफ्तार अब तक धीमी क्यों है।







