इंदौर जिस शहर की पहचान रात ढलते ही जगमगाती थालियों और चटपटे स्वाद से होती थी, वही इंदौर आज एक अजीब विडंबना का शिकार बन गया है। चमकती हुई रातों के लिए मशहूर सराफा बाज़ार की रौनक पर अब कमर्शियल एलपीजी गैस संकट का साया पड़ गया है।
बताया जा रहा है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान-अमेरिका तनाव के चलते वैश्विक ईंधन आपूर्ति प्रभावित हुई है। लेकिन सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय संकट की मार आखिर सीधे छोटे दुकानदारों पर ही क्यों टूट रही है?
कभी रात भर महकने वाली सराफा की गलियां, जहां गरमागरम भुट्टे, कुरकुरे भजिए, गराडू और पोहा-जलेबी की खुशबू तैरती थी, आज वहां बेचैनी है। दुकानदार गैस सिलेंडर के लिए भटक रहे हैं और प्रशासनिक रोक ने उनके धंधे की कमर तोड़ दी है।
हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई दुकानदारों ने मजबूरी में गैस चूल्हे छोड़कर इंडक्शन स्टोव और इलेक्ट्रिक ग्रिल का सहारा लेना शुरू कर दिया है। चौपाटी पर अब वही भजिए, जो कभी उबलते तेल में गैस की तेज आंच पर तले जाते थे, अब इंडक्शन पर जैसे-तैसे तैयार हो रहे हैं। एक दुकानदार की आवाज में गुस्सा साफ झलकता है। “गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा… तो क्या दुकान बंद कर दें? ग्राहक आएंगे तो कुछ तो परोसना पड़ेगा। सरकार को हमारी चिंता है भी या नहीं?”
इंदौर की पहचान सिर्फ इमारतों से नहीं, बल्कि उसके स्वाद से है। लेकिन जब सिस्टम की लापरवाही और वैश्विक संकट का बोझ सीधे छोटे कारोबारियों पर डाल दिया जाता है, तो सवाल उठना लाजमी है। क्या शहर की मशहूर फूड कल्चर को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे? या फिर इंदौर की रातों की पहचान अब हमेशा के लिए जुगाड़ के सहारे ही चलती रहेगी?







