इंदौर के तिलक नगर थाना क्षेत्र से सामने आई यह खबर नहीं, बल्कि सिस्टम पर एक करारा तमाचा है। 23 साल की उमंग प्रजापति… एक पढ़ी-लिखी, कामकाजी युवती… जिसने चुपचाप फांसी का फंदा चुना और फिर दो पूरे दिन तक उसी फंदे पर लटकी रही। हैरानी नहीं, शर्म की बात यह है कि न पड़ोसियों को भनक लगी, न मकान मालिक को, और न ही उस समाज को जो हर बात पर ज्ञान बांटने में सबसे आगे रहता है।
जब कमरे से बदबू उठी, तब जाकर किसी को “अहसास” हुआ कि अंदर कुछ गलत है। सवाल यह नहीं कि बदबू क्यों आई, सवाल यह है कि उमंग की तकलीफ किसी को क्यों नहीं दिखी?
पुलिस के मुताबिक उमंग पहले एक बैंक में नौकरी करती थी, लेकिन उसने काम छोड़ दिया था। बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में थी। डिप्रेशन… वही शब्द, जिसे हम अक्सर मजाक समझकर टाल देते हैं। न कोई सुसाइड नोट मिला, न कोई आखिरी चीख। बस एक मोबाइल फोन मिला है, जिसे अब पुलिस कस्टडी में लेकर “जांच” की जाएगी। जांच उस वक्त क्यों नहीं हुई, जब वह जिंदा थी?
14 जनवरी को मां से आखिरी बार बात हुई थी। एक मां… जो शायद रोज फोन पर बेटी की आवाज सुनकर सुकून पाती होगी। उसे क्या पता था कि वही आवाज आखिरी होगी।
उमंग मूल रूप से भोपाल की रहने वाली थी। पिता व्यापार करते हैं, मां और छोटी बहन घर पर हैं। जैसे ही खबर मिली, पूरा परिवार भोपाल से इंदौर दौड़ा चला आया। एमवाय अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया जा रहा है और शव को भोपाल ले जाया जाएगा, जहां अंतिम संस्कार होगा।







