मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक अहम और संवेदनशील मामले में दुष्कर्म से गर्भवती हुई नाबालिग बालिका को गर्भपात की अनुमति देकर महत्वपूर्ण मिसाल पेश की है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि पीड़िता और उसकी मां को निचली अदालत से राहत न मिलने के कारण हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जो न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक स्थिति है।
कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में समय पर निर्णय बेहद जरूरी होता है, क्योंकि देरी पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है। इस फैसले को महिला अधिकारों और पीड़ित संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
निचली अदालतों को सख्त निर्देश, पॉक्सो कोर्ट को दी गई जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निचली अदालतों, खासकर विशेष पॉक्सो कोर्ट्स को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे ऐसे मामलों में कानून और निर्धारित प्रक्रिया (SOP) का पालन करते हुए स्वयं गर्भपात की अनुमति देने में सक्षम हैं। कोर्ट ने कहा कि हर मामले को हाईकोर्ट तक ले जाना आवश्यक नहीं होना चाहिए, इससे पीड़िताओं को अनावश्यक परेशानी होती है।
यह मामला रतलाम जिले का है, जहां जनवरी 2022 में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 506 के साथ-साथ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया। घटना के बाद पीड़िता गर्भवती हो गई थी और उसकी मां ने मार्च 2022 में विशेष पॉक्सो कोर्ट से गर्भपात की अनुमति मांगी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने न केवल पीड़िता को राहत दी, बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाने की दिशा में भी स्पष्ट संदेश दिया है।







