चारधाम यात्रा… आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक, या अब पहचान की सबसे सख्त परीक्षा? उत्तराखंड में वो प्रस्ताव सामने आ चुका है, जिसने धार्मिक स्वतंत्रता, संविधान और सामाजिक सौहार्द तीनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मंदिर समितियों ने सरकार को प्रस्ताव सौंप दिया है। प्रस्ताव साफ है, कठोर है और बेहद विवादास्पद है चारधाम यात्रा के दौरान सभी मंदिरों में मुसलमानों की एंट्री पर पूरी तरह बैन। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री…और सिर्फ यही नहीं राज्य के कुल 48 मंदिरों में पाबंदी की तैयारी।
हैरानी यहीं खत्म नहीं होती। सिख, जैन और बौद्ध समुदाय को इस नियम से बाहर रखा गया है, लेकिन सवाल सीधा है क्या आस्था अब धर्म देखकर तय होगी?
क्या देवभूमि में प्रवेश अब पहचान पत्र से होगा, श्रद्धा से नहीं? मंदिर समितियों का दावा है ये आस्था की शुद्धता के लिए है। लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं तो फिर संविधान किस काम का? देश धर्मनिरपेक्ष है, या अब आस्था भी चयनित होगी? सरकार फिलहाल चुप है। लेकिन चुप्पी खुद बहुत कुछ बोल रही है।
चारधाम की पहाड़ियों में आज मंत्रों से ज़्यादा गूंज है एक फैसले की, जो देश को जोड़ने के बजाय कहीं और न बाँट दे।







