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ट्रम्प बोले- NATO मदद करे नहीं तो खराब भविष्य होगा:चीन को धमकी- मार्च में होने वाली बैठक टालेंगे;

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब 17वें दिन में पहुंच चुका है और इस बीच अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बड़ा बयान देकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रविवार को ट्रम्प ने NATO देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सहयोगी देश होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने में अमेरिका की मदद नहीं करते, तो NATO का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका हमेशा अपने सहयोगियों के साथ खड़ा रहा है। उन्होंने यूक्रेन का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका को वहां मदद करने की मजबूरी नहीं थी, फिर भी उसने सहयोग किया। अब समय है कि NATO देश भी अमेरिका का साथ दें। ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि अगर चीन होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रखने में सहयोग नहीं करता, तो वह इस महीने के अंत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली अपनी प्रस्तावित बैठक को टाल सकते हैं। ट्रम्प का 31 मार्च को चीन दौरा प्रस्तावित है।

दरअसल, अमेरिका ने उन सभी देशों से अपील की है जिनका तेल व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है, वे इस रणनीतिक समुद्री रास्ते की सुरक्षा के लिए अपने युद्धपोत और सैन्य सहायता भेजें। वैश्विक तेल सप्लाई का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है, इसलिए इसकी सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।

ईरान ने इजराइल पर दागी ‘सेजिल’ बैलिस्टिक मिसाइल, कई सैन्य ठिकाने निशाने पर

इसी बीच ईरान ने संघर्ष को और तेज करते हुए इजराइल पर अपनी रणनीतिक ‘सेजिल’ बैलिस्टिक मिसाइल दागने का दावा किया है। ईरान की इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के अनुसार इस हमले का लक्ष्य इजराइल की सैन्य और डिफेंस फैसिलिटी थीं। ‘सेजिल’ एक सॉलिड फ्यूल वाली लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जो करीब 2000 से 2500 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम मानी जाती है।

रक्षा मामलों की पत्रिका ‘द नेशनल इंटरेस्ट’ के मुताबिक इस मिसाइल की रेंज इतनी व्यापक है कि यह मिस्र, सूडान के कुछ हिस्सों, यूक्रेन के बड़े हिस्से, दक्षिणी रूस, पश्चिमी चीन और भारत तक पहुंच सकती है। इसके अलावा हिंद महासागर और भूमध्य सागर के कई रणनीतिक इलाकों को भी इसकी रेंज में माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल सप्लाई, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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