कर्नाटक की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां राज्य सरकार के बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार को लेकर दिल्ली में हलचल तेज हो गई है।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और राज्य के कई प्रतिनिधियों ने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से दिल्ली में मुलाकात की। इस अहम बैठक में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर लंबी चर्चा हुई। सूत्रों की मानें तो करीब 20 नए मंत्रियों के नामों पर अंतिम फैसला जल्द लिया जा सकता है और अगले सप्ताह नए मंत्रियों का शपथ ग्रहण भी संभव है।
फिलहाल कर्नाटक सरकार में मुख्यमंत्री समेत केवल 14 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्य में कुल 34 मंत्री बनाए जा सकते हैं। यानी अब भी लगभग 20 मंत्री पद खाली हैं, जिन्हें भरने की तैयारी चल रही है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर कैबिनेट विस्तार में इतनी देरी क्यों हुई? दरअसल, कांग्रेस आलाकमान इस बार हर फैसले को बेहद संतुलित तरीके से लेना चाहता है। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, अनुभवी और नए नेताओं के बीच तालमेल, इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर सूची तैयार की जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, दोनों खेमों की ओर से अलग-अलग नाम प्रस्तावित किए गए हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व ऐसा फॉर्मूला तलाश रहा है जिससे किसी भी गुट में असंतोष न पैदा हो।
कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत, वोक्कालिगा और कुरबा समाज की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। यही वजह है कि कैबिनेट गठन में इन समुदायों के प्रतिनिधित्व पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि नए मंत्रिमंडल में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता मिलेगी।
अब सबकी निगाहें कांग्रेस हाईकमान के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। क्या अगले सप्ताह कर्नाटक को पूरा मंत्रिमंडल मिलेगा और क्या सभी गुटों को साधने में कांग्रेस सफल होगी? इसका जवाब जल्द सामने आ सकता है।







