यह मामला सिर्फ एक जज को मिली धमकी का नहीं, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था की गरिमा और स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम मॉब लिंचिंग केस में 14 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाने वाली एडीजे तबस्सुम खान को कथित तौर पर सोशल मीडिया पर कत्लेआम की धमकियां दी गईं। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गईं और उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) से तीन दिन के भीतर विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत जानना चाहती है कि अब तक क्या कार्रवाई हुई, सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए और दोषियों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसका फैसला किसी व्यक्ति या वर्ग को पसंद नहीं आया। अदालत ने ऐसी घटनाओं को न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश बताया और कहा कि यह कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती है।
बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर करीब 150 अकाउंट से आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट साझा किए गए। इस घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी चिंता जताई। संगठन का कहना है कि यदि किसी न्यायिक फैसले से असहमति है तो उसका रास्ता अपीलीय अदालत है, न कि जजों को धमकाना या उनकी छवि खराब करना।
अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और प्रशासन की कार्रवाई पर है। यह मामला केवल एक जज की सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कानून के सम्मान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है।







