अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की एक और कोशिश शुरू होती दिख रही है, लेकिन शुरुआत से ही इस संभावित बातचीत पर संशय के बादल छाए हुए हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर को पाकिस्तान भेजने का फैसला किया है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में एक दिलचस्प मोड़ सामने आया है। जहां व्हाइट हाउस सीधे शांति वार्ता की बात कर रहा है, वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका से आमने-सामने बातचीत नहीं करेगा। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई के मुताबिक, बातचीत अगर होती है तो वह पाकिस्तान के जरिए ही होगी। इसका मतलब साफ है पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान इस तरह की बातचीत की मेजबानी कर रहा है। 11-12 अप्रैल को इसी तरह की वार्ता पहले भी हो चुकी है, जो करीब 21 घंटे तक चली लेकिन किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। उस दौरान भी मतभेद दो बड़े मुद्दों पर अटके रहे—होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण और ईरान का परमाणु कार्यक्रम।
अमेरिका की प्राथमिकता साफ है: वह चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से वैश्विक तेल आपूर्ति बिना किसी रुकावट के जारी रहे। दूसरी ओर, ईरान इस क्षेत्र को अपने रणनीतिक प्रभाव का हिस्सा मानता है और इसे बातचीत में दबाव के तौर पर इस्तेमाल करता है।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी दोनों देशों के बीच गहरी खाई बनी हुई है। अमेरिका को आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है, जबकि ईरान बार-बार यह कहता रहा है कि उसका कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों, जैसे ऊर्जा उत्पादन, के लिए है। अब सवाल यही है क्या इस बार बातचीत किसी नतीजे तक पहुंचेगी, या फिर यह कोशिश भी पहले की तरह बेनतीजा रह जाएगी?







