मध्य प्रदेश में होली के रंग अभी फीके भी नहीं पड़े थे कि सरकार ने फिर से कर्ज की पिचकारी चला दी। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने पहले 6300 करोड़ रुपए का कर्ज लिया और अब मंगलवार को फिर 5800 करोड़ रुपए के तीन नए कर्ज लेने का फैसला कर दिया।
जी हां… यानी प्रदेश की तिजोरी खाली है या खर्चे इतने बेकाबू हो चुके हैं कि सरकार को बार-बार उधार का सहारा लेना पड़ रहा है। सवाल ये है कि आखिर ये कर्ज लिया किसके लिए जा रहा है और इसकी कीमत चुकाएगा कौन? जवाब साफ है
इन तीनों नए कर्जों को अलग-अलग अवधि के बॉन्ड के जरिए लिया जा रहा है।
1900 करोड़ रुपए का कर्ज 10 साल के लिए,
1700 करोड़ रुपए का कर्ज 14 साल के लिए,
और 2200 करोड़ रुपए का कर्ज पूरे 21 साल के लिए।
मतलब साफ है… आज फैसले लेने वाले नेता तो कुर्सी छोड़ देंगे, लेकिन इस कर्ज की किस्तें आने वाली पीढ़ियां चुकाती रहेंगी। इन नए कर्जों के साथ ही चालू वित्त वर्ष में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लिए गए कुल कर्ज का आंकड़ा करीब 84,900 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा। और अगर कुल देनदारी की बात करें तो प्रदेश पर कर्ज का पहाड़ अब लगभग 5 लाख 6 हजार 640 करोड़ रुपए का हो चुका है।
यानि हर फैसले के साथ राज्य की आर्थिक हालत और ज्यादा बोझिल होती जा रही है। सवाल उठना लाजमी है क्या विकास के नाम पर सिर्फ उधारी का खेल चल रहा है? यह पूरा कर्ज भारतीय रिजर्व बैंक के Reserve Bank of India के E-Kuber प्लेटफॉर्म के जरिए बॉन्ड नीलामी से लिया जा रहा है। इस नीलामी में सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि कई और राज्य भी उधारी की लाइन में खड़े हैं। Karnataka 10 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले रहा है और Tamil Nadu 8 हजार करोड़ रुपए उधार लेने जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी वही है क्या सरकार विकास कर रही है या सिर्फ कर्ज के सहारे अर्थव्यवस्था को खींच रही है? क्योंकि अगर यही रफ्तार रही… तो आने वाले सालों में मध्य प्रदेश की पहचान विकास से नहीं, बल्कि कर्ज के बोझ से होने लगेगी।







