टी-20 वर्ल्ड कप जीतकर भारतीय क्रिकेट टीम ने देश को गर्व का मौका दिया। पूरे देश में लोग खुश थे, सड़कों पर जश्न था, तिरंगे लहरा रहे थे। लेकिन मध्य प्रदेश के देवास, उज्जैन और शाजापुर में कुछ लोगों ने इस खुशी को जश्न नहीं बल्कि हंगामे में बदल दिया।
देवास के सयाजीद्वार पर लोग रंग-गुलाल उड़ा रहे थे, पटाखे चला रहे थे और भारत की जीत का जश्न मना रहे थे। तभी अचानक कुछ युवकों ने जलते हुए पटाखे भीड़ के बीच फेंकने शुरू कर दिए। देखते ही देखते खुशियों का माहौल अफरा-तफरी में बदल गया। लोग इधर-उधर भागने लगे, चीख-पुकार मच गई।पटाखों से निकली चिंगारियों की चपेट में आकर सुरक्षा बल के दो जवान आशीष यादव और सुरेंद्र श्रीवास घायल हो गए। सुरेंद्र के मुंह और सिर पर चोट लगी। दोनों को जिला अस्पताल में इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई, लेकिन सवाल यह है कि आखिर जश्न के नाम पर यह लापरवाही कब तक चलेगी?
इतना ही नहीं, हालात तब और बिगड़ गए जब सीएसपी सुमित अग्रवाल के कान के पास ही एक बम फट गया। उन्हें तुरंत एमजी अस्पताल ले जाकर जांच करानी पड़ी। सोचिए, जब पुलिस अधिकारी तक सुरक्षित नहीं हैं तो आम लोगों की हालत क्या होगी?
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को भीड़ को काबू में करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा। यानी जिस जीत पर लोग खुशी मनाने निकले थे, वही रात कुछ लोगों की गैरजिम्मेदारी के कारण तनाव और डर में बदल गई। पुलिस ने मौके से चार लोगों को हिरासत में लिया है और सीसीटीवी कैमरों की मदद से बाकी उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक देश की जीत के जश्न को कुछ लोग अपनी मनमानी और गुंडागर्दी का मंच बनाते रहेंगे?
जश्न मनाना गलत नहीं है, लेकिन अगर वही जश्न किसी की जान पर बन जाए, सुरक्षा बल के जवान घायल हो जाएं और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़े, तो इसे खुशी नहीं बल्कि शर्मनाक हरकत ही कहा जाएगा। देश की जीत पर खुशी मनाइए, लेकिन याद रखिए… तिरंगा हाथ में लेकर अगर कानून को ही आग में झोंक दिया जाए, तो वह जश्न नहीं, अराजकता कहलाती है।







