इंदौर का कलानी नगर चौराहा आज फिर सवालों के घेरे में है। शहर की रफ्तार के बीच यह चौराहा अब ट्रैफिक का नहीं, बल्कि लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। आज सुबह जो हुआ, उसने हर माता-पिता की रूह कंपा दी। 60 स्कूली बच्चों से भरी एक बस इस बदहाल चौराहे पर बड़ी दुर्घटना का शिकार होते-होते बची। कुछ सेकंड… बस कुछ सेकंड और हालात कुछ और होते। चीखें गूंजतीं, सायरन बजते, और फिर वही घिसा-पिटा बयान “जांच के आदेश दे दिए गए हैं।” लेकिन सवाल ये है कि जांच हर हादसे के बाद ही क्यों होती है? पहले क्यों नहीं?
कलानी नगर चौराहे की टूटी सड़कें, गड्ढों से भरा मोड़, अव्यवस्थित ट्रैफिक और सिग्नल की अनदेखी क्या ये सब किसी को दिखाई नहीं देता? या फिर इंतज़ार है किसी बड़ी त्रासदी का, ताकि कैमरे आएं, नेता आएं और संवेदनाओं की राजनीति शुरू हो?
60 बच्चे… 60 जिंदगियां… क्या उनकी सुरक्षा इतनी सस्ती है?
बस चालक ने सूझबूझ दिखाई, ब्रेक समय पर लगाए, वरना आज तस्वीर कुछ और होती। लेकिन क्या हर बार किस्मत और ड्राइवर की हिम्मत ही बच्चों की सुरक्षा की गारंटी रहेगी? प्रशासन के दावों और हकीकत के बीच की खाई अब साफ दिखाई देने लगी है। शहर स्मार्ट बनने की बात करता है, लेकिन चौराहे बेसिक सुरक्षा के लिए तरस रहे हैं। अब सवाल सीधे हैं, कब सुधरेगा यह चौराहा?
कब जागेगा प्रशासन? या फिर किसी बड़ी खबर का इंतजार है, जिसमें आंकड़े सिर्फ “60” नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा हों? यह चेतावनी है… हादसे की दस्तक है… और अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली बार सिर्फ “बच गए” लिखने का मौका भी शायद न मिले।







