विधानसभा में इंदौर के दूषित पानी पर घमासान, सरकार और विपक्ष आमने-सामने
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के पांचवें दिन शुक्रवार को इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों का मुद्दा सदन में जोरदार तरीके से गूंजा। इस संवेदनशील मामले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सदन में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि घटना सामने आते ही प्रशासन हरकत में आ गया था। प्रभावित क्षेत्रों में तुरंत चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराई गईं, पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे गए और नई पाइपलाइन बिछाने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया। उन्होंने बताया कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई भी की गई है।
मंत्री ने यह भी कहा कि संबंधित इलाका करीब 90 साल पुरानी बस्ती है, जहां बुनियादी ढांचे की समस्याएं जटिल हैं। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र की परिस्थितियों के कारण नगर निगम कर्मचारियों को काम करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। महापौर द्वारा टेंडर जारी किए जाने के बावजूद कार्य समय पर शुरू नहीं हो पाया, जिससे स्थिति बिगड़ी।
स्थगन प्रस्ताव पर टकराव, नियमों का हवाला देकर चर्चा से इनकार
सरकार के जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने इस मामले पर स्थगन प्रस्ताव के तहत चर्चा कराने की मांग की। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की मूल जिम्मेदारी है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ‘काला पानी’ की सजा के बारे में तो सुना था, लेकिन यहां लोगों को सचमुच काला पानी पिलाया जा रहा है।
विपक्ष के हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने नियमों का हवाला देते हुए स्थगन प्रस्ताव की अनुमति देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि विधानसभा की नियमावली के नियम 55 के उपखंड 5 के अनुसार जिस विषय पर सदन में पहले ही चर्चा हो चुकी हो, उस पर स्थगन प्रस्ताव के तहत पुनः चर्चा नहीं की जा सकती।
हालांकि, विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार से ठोस जवाब की मांग करता रहा। सदन में कुछ देर तक शोर-शराबा भी हुआ, जिसके बाद कार्यवाही आगे बढ़ाई गई। इंदौर की घटना को लेकर राजनीतिक तापमान फिलहाल कम होता नजर नहीं आ रहा है।







