लोकसभा में लगातार दूसरे दिन भी राहुल गांधी का भाषण हंगामे की भेंट चढ़ गया। दोपहर करीब 2 बजे राहुल गांधी ने सदन में पूर्व आर्मी चीफ की एक अनपब्लिश्ड किताब से जुड़े आर्टिकल का हवाला देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उठाने की कोशिश की। उनका कहना था कि उन्हें बोलने की अनुमति दी जाए, क्योंकि वे विपक्ष के नेता हैं और देश को सच्चाई जानने का हक है।
राहुल ने जैसे ही चीन-भारत तनाव और पूर्वी लद्दाख का ज़िक्र किया, एनडीए के सांसदों ने टोका-टोकी शुरू कर दी। राहुल करीब 14 मिनट तक अपनी बात रखने की कोशिश करते रहे। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि चीन-भारत के बीच वास्तव में क्या हुआ और कैसे पूर्वी लद्दाख में हमारे सैनिक शहीद हुए। लेकिन शोर-शराबे के बीच उनकी बात अधूरी रह गई और आखिरकार लोकसभा की कार्यवाही 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
यह पहला मौका नहीं था। सोमवार को भी राहुल गांधी ने 46 मिनट तक अपनी बात रखने की कोशिश की थी, लेकिन उस दिन भी सदन की कार्यवाही तीन बार स्थगित करनी पड़ी। आंकड़े खुद कहानी कह रहे हैं—रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 बार, गृह मंत्री अमित शाह ने 7 बार, किरेन रिजिजू ने 2 बार और अनुराग ठाकुर ने 6 बार राहुल गांधी को बीच में रोका।
विपक्ष का एकजुट संदेश: बोलने नहीं दिया गया तो हम भी नहीं बोलेंगे
इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्ष ने एकजुटता का संकेत भी दिया। राहुल गांधी के समर्थन में समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश उत्तम पटेल, तृणमूल कांग्रेस की सांसद शताब्दी रॉय और डीएमके सांसद डी एम कातिर आनंद ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से इनकार कर दिया।
संसद के भीतर सवाल अब सिर्फ राहुल गांधी के भाषण का नहीं रह गया है, बल्कि यह बहस बनती जा रही है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी विपक्ष को पूरी बात रखने का मौका मिलेगा या नहीं। हंगामे के शोर में जवाब फिर एक बार अधूरे रह गए।







