मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती, लेकिन यह हकीकत है और अब इसका सबसे भावुक अध्याय सामने है।
31 जनवरी को पाकिस्तान ने सात भारतीय कैदियों को रिहा किया, जिनमें प्रसन्नजीत रंगारी का नाम भी शामिल था। पाकिस्तान की जेल में वे ‘सुनील अदे’ के नाम से बंद थे। 1 अक्टूबर 2019 को उन्हें बाटापुर इलाके से हिरासत में लिया गया था, लेकिन भारत में उनके परिवार को इसकी खबर काफी बाद में, दिसंबर 2021 में लगी। तब से शुरू हुआ एक अंतहीन सा संघर्ष जिसे अकेले उनकी बहन संघमित्रा ने थामे रखा।
बहन का हौसला, भाई की वापसी
अमृतसर में पूरी हुई कानूनी प्रक्रिया, परिवार की आंखें रास्ते पर टिकीं
जैसे ही भाई के पाकिस्तान की जेल में होने की पुष्टि हुई, संघमित्रा ने हार नहीं मानी। प्रशासन, जनप्रतिनिधि, मीडिया हर दरवाज़ा खटखटाया गया। सालों की कोशिशों के बाद आखिरकार वह दिन आया, जब संघर्ष रंग ले आया।
अटारी–वाघा बॉर्डर पर कस्टम और इमिग्रेशन की सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद प्रसन्नजीत को अमृतसर के रेड क्रॉस भवन (मजीठा रोड) और गुरु नानक देव अस्पताल में रखा गया है। यहां उनकी चिकित्सीय जांच और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण प्रशासन से मदद की गुहार लगाई गई थी। इस पर कलेक्टर मृणाल मीणा ने बताया कि परिवार के अनुरोध के बाद ग्राम सचिव के साथ परिजनों के लिए यात्रा टिकट की व्यवस्था की जा रही है।
अब खैरलांजी के उस घर में, जहां वर्षों से इंतज़ार ने डेरा डाल रखा था, उम्मीद की दस्तक सुनाई दे रही है। सरहद के उस पार छूटा अंधेरा पीछे रह गया है—और सामने है घर लौटते प्रसन्नजीत की कहानी, जो सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हौसले और रिश्तों की जीत है।







