उज्जैन से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित तराना पिछले 36 घंटों से सुलग रहा है। एक शांत कस्बा अचानक दहशत, धुएं और डर के बीच घिर गया। एक दर्जन से ज्यादा बसें, करीब 9 कारें, कई दुकानें और घर सब हिंसा की आग में झुलस गए। एक बस को बीच सड़क पर आग के हवाले कर दिया गया। गलियों में पत्थर चले, हथियार लहराए गए और लाठी-डंडों से घरों को निशाना बनाया गया।
सबसे बड़ा सवाल क्या पुलिस सब कुछ देखती रही?
25 हजार की आबादी वाले इस कस्बे में हालात काबू से बाहर होते चले गए, जबकि मौके पर 350 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात हैं। बावजूद इसके, तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा। बाजार बंद हैं, गलियां सूनी हैं और हर चेहरे पर डर साफ झलक रहा है।
दो नाम, एक टकराव और पूरा शहर जल उठा
इस भड़की हिंसा की कहानी में किरदार सिर्फ दो हैं एक नाम साहिल ठाकुर और दूसरा सलमान बेग। दोनों को हिंदू और मुस्लिम पक्ष भली-भांति जानते हैं। बताया जा रहा है कि बजरंग दल के प्रचारक साहिल ठाकुर की लव जिहाद के खिलाफ मुहिम और गाय संरक्षण से जुड़ी गतिविधियां लंबे समय से चर्चा में थीं। इसी को लेकर काजी चौक निवासी सलमान बेग से उसकी तनातनी चल रही थी।
23 जनवरी की शाम एक मामूली घटना ने पूरे तराना को आग में झोंक दिया। सूचना मिली कि एक गाय के मुंह में डिब्बा फंस गया है। साहिल ठाकुर और रजत ठाकुर गाय को बचाने पहुंचे। तभी वहां से गुजर रहे सलमान बेग ने गाड़ी रोकी, साहिल को अपशब्द कहे और आगे बढ़ गया।
यहीं से शुरू हुई वो चिंगारी, जिसने कुछ ही घंटों में पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि गलती किसकी थी—सवाल ये है कि जब शहर जल रहा था, तब उसे बुझाने की जिम्मेदारी किसकी थी?







