प्रयागराज… जहां संगम पर शांति, साधना और सनातन की गरिमा बसती है, वहीं माघ मेले में आज सत्ता और संत आमने-सामने आ गए। दृश्य ऐसा था जिसने हर सनातनी के मन में आक्रोश भर दिया। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्य, जो अपने गुरु के साथ स्नान को जा रहे थे, उन्हें पुलिस ने रोका और फिर हालात संभालने के बजाय आग में घी डाल दिया गया।
धक्का-मुक्की शुरू हुई, अफसरों से तीखी बहस हुई और फिर वही हुआ जो अक्सर ताकत के नशे में होता है। पुलिस ने शिष्यों को दौड़ा-दौड़ा कर पकड़ा, घसीटा, पीटा। एक साधु को चौकी में गिरा-गिरा कर मारा गया। सवाल ये है क्या यही प्रशासन की मर्यादा है? क्या संत अब अपराधी हैं?
जब शिष्यों पर लाठियां बरसीं, तो शंकराचार्य शांत कैसे रहते? वे धरने पर बैठ गए। अफसर हाथ जोड़ते रहे, मिन्नतें करते रहे, लेकिन अब बात सम्मान की थी। दो घंटे तक संगम क्षेत्र में तनाव पसरा रहा। आखिरकार, समाधान निकालने के बजाय पुलिस ने सभी समर्थकों को हिरासत में ले लिया। क्या यह संवाद है या दमन? इतना ही नहीं शंकराचार्य की पालकी को जबरन खींचते हुए संगम से एक किलोमीटर दूर ले जाया गया। पालकी का क्षत्रप टूट गया, स्नान नहीं हो पाया। सोचिए, जिस संत पर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था टिकी हो, उसके साथ ऐसा व्यवहार! क्या यही धार्मिक स्वतंत्रता है?
विवाद की जड़ में वही पुराना सवाल भीड़। पुलिस ने कहा रथ से उतरिए, पैदल चलिए। शिष्य नहीं माने। बहस बढ़ी और फिर प्रशासन का असली चेहरा सामने आ गया। शंकराचार्य का बयान आग की तरह फैला उन्होंने साफ कहा कि हमारे संतों को बड़े-बड़े अधिकारी मार रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब ऊपर के आदेश पर हुआ। सरकार उनसे नाराज है, क्योंकि उन्होंने महाकुंभ की भगदड़ के लिए जिम्मेदारी तय की थी। अब बदला लिया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सच बोलना अपराध बन गया है? क्या संत सत्ता से सवाल नहीं कर सकते? और अगर कर लें, तो क्या जवाब लाठियों से मिलेगा? प्रयागराज की धरती आज गवाह है यह सिर्फ एक धक्का-मुक्की नहीं, यह टकराव है आस्था और अहंकार के बीच। अब देखना यह है कि सरकार इसे व्यवस्था कहेगी… या जवाबदेही से फिर भागेगी।







