ये कोई फिल्मी सीन नहीं था, ये उज्जैन की हकीकत थी। एक 16 साल का नाबालिग हाथ बंधे, कपड़े उतारे गए, रस्सी से जकड़ा हुआ और भीड़… बेपरवाह, बेरहम, बेखौफ। सवाल ये नहीं कि उसने क्या किया, सवाल ये है कि भीड़ ने खुद को भगवान किस दिन मान लिया?
प्रेम प्रसंग के शक ने कानून को कुचल दिया। आरोप लगा, फैसला सुनाया गया और सज़ा भी वहीं दे दी गई सरेआम। डेढ़ किलोमीटर तक घसीटा गया बच्चा, और हर कदम पर इंसानियत शर्म से सिर झुकाती रही। सैकड़ों आंखें थीं, मगर किसी में हिम्मत नहीं थी। किसी ने बचाया नहीं, सबने रिकॉर्ड किया। मोबाइल ऑन थे, ज़मीर ऑफ।
यहां भीड़ न्यायाधीश बनी, जल्लाद बनी और तमाशबीन भी। पुलिस बाद में चौंकी, सिस्टम बाद में जागा लेकिन उस वक्त? उस वक्त सड़कों पर कानून नंगा था और क्रूरता कपड़े पहनकर घूम रही थी।
याद रखिए, आज एक नाबालिग को घसीटा गया है। कल किसी और का नंबर हो सकता है। क्योंकि जब भीड़ फैसला करने लगे, तो सच मरता है, इंसानियत हारती है और सभ्यता सिर्फ वीडियो में रह जाती है।







