मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने इंसानियत और सुरक्षा व्यवस्था दोनों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक पूरा 116 सदस्यीय आदिवासी कुनबा आज भी डर के साये में जीने को मजबूर है। हालत इतनी भयावह है कि परिवार के करीब 20 बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। उनका कहना है… “पहले जान बचानी है, पढ़ाई बाद में होगी।”
यह मामला झाबुआ के दोतड़ गांव के सालेड़ा फलिया का है। विवाद की शुरुआत साल 2019 में एक शादी समारोह के दौरान डीजे बजाने को लेकर हुए झगड़े से हुई। देखते ही देखते मामूली कहासुनी खूनी संघर्ष में बदल गई और एक व्यक्ति की मौत हो गई। हत्या के आरोप में नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। वर्षों बाद आठ आरोपी जमानत पर बाहर आए, लेकिन गांव लौटने का संघर्ष खत्म नहीं हुआ।
परिवार का आरोप है कि हत्या के बाद उनके करीब 20 घर ढहा दिए गए, अनाज लूट लिया गया, मवेशी छीन लिए गए और लगभग 150 बीघा जमीन पर कब्जा कर लिया गया। पुरुष जेल में थे, इसलिए महिलाएं और बच्चे जान बचाकर गुजरात भागने को मजबूर हो गए।
परिवार का दावा है कि गांव में दोबारा बसने के बदले उनसे 25 लाख रुपये की मांग की गई, जबकि वे समझौते के लिए कम राशि देने को तैयार थे। कई सामाजिक पंचायतें हुईं, लेकिन विवाद का समाधान नहीं निकल सका।
आखिरकार एसपी कार्यालय में गुहार लगाने के बाद प्रशासन ने पुलिस सुरक्षा के बीच परिवार की गांव वापसी कराई। फिलहाल गांव में पुलिस तैनात है, लेकिन महिलाओं और बच्चों का कहना है कि डर अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस का पहरा इस परिवार को स्थायी सुरक्षा दिला पाएगा? क्या बच्चे फिर से स्कूल लौट पाएंगे? और क्या सात साल पुराना यह विवाद कभी पूरी तरह खत्म हो सकेगा?
फिलहाल झाबुआ का यह आदिवासी कुनबा अपने घर, अपनी जमीन और सबसे बढ़कर अपने सुरक्षित भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है।







