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कूटनीति के जाल में फंसा पाकिस्तान,ट्रम्प की शर्त ने बढ़ाई इस्लामिक दुनिया की टेंशन

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की एक नई शर्त ने पाकिस्तान को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हर रास्ता मुश्किल नजर आ रहा है। ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत 6 मुस्लिम देशों से कहा है कि वे ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर हस्ताक्षर करें और इजराइल को आधिकारिक मान्यता दें। लेकिन पाकिस्तान ने सबसे पहले इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

अमेरिकी थिंकटैंक अटलांटिक काउंसिल के एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन का बयान अब चर्चा में है। उन्होंने कहा था कि “ट्रम्प के जितना करीब जाओगे, उतना ही जोखिम बढ़ेगा। वह कभी भी ऐसी मांग कर सकते हैं जिसे मानना आसान नहीं होगा।” आज पाकिस्तान ठीक उसी हालात में दिखाई दे रहा है।

दरअसल, पाकिस्तान और इजराइल के बीच दुश्मनी कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत 1947 में ही हो गई थी, जब संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के बंटवारे का प्रस्ताव आया। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उस समय खुलकर विरोध किया और अरब देशों के समर्थन में खड़े हो गए।

1948 में इजराइल के गठन के बाद भी पाकिस्तान ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते आज तक सामान्य नहीं हो पाए।

इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया, जब पाकिस्तान सीधे अरब-इजराइल युद्ध का हिस्सा बन गया। 1967 की ‘छह दिन की जंग’ में पाकिस्तान ने अपने लड़ाकू पायलट अरब देशों की मदद के लिए भेजे। पाकिस्तानी पायलट सैफुल आजम ने जॉर्डन और इराक की ओर से लड़ते हुए चार इजराइली विमानों को मार गिराने का दावा किया। पाकिस्तान आज भी इस घटना को अपनी बड़ी सैन्य उपलब्धि के तौर पर पेश करता है।

अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में अपनी दशकों पुरानी नीति बदल पाएगा? या फिर इस मुद्दे पर वह इस्लामिक दुनिया के साथ खड़ा रहेगा? फिलहाल पाकिस्तान ने साफ संकेत दे दिए हैं कि इजराइल को मान्यता देना उसके लिए आसान फैसला नहीं होगा।

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