28 जनवरी का फैसला और नया प्रावधान
28 जनवरी को केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए। इन निर्देशों के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ का वादन अनिवार्य रूप से किया जाएगा। साथ ही, इस दौरान उपस्थित सभी लोगों का खड़े होना भी अनिवार्य बताया गया है।
सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय एकता, सम्मान और सांस्कृतिक विरासत को सशक्त करने की दिशा में उठाया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रगीत देश की स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक धरोहर रहा है और इसे सार्वजनिक आयोजनों में सम्मान देना राष्ट्र के प्रति आदर का प्रतीक है।
हालांकि, आदेश के सार्वजनिक होते ही विभिन्न संगठनों और समुदायों में इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। जहां कुछ वर्गों ने इसे राष्ट्रभावना से जोड़कर सराहा, वहीं कुछ ने इसे व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में सवालों के घेरे में रखा।
उज्जैन से उठी आपत्ति और धार्मिक स्वतंत्रता की दलील
इस मुद्दे पर उज्जैन से एक तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। शहर के इमाम मुफ्ती सैय्यद नासिर अली नदवी ने इस आदेश को इस्लाम विरोधी करार दिया है। उनका कहना है कि यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हस्तक्षेप है।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के कुछ शब्दों की व्याख्या इस प्रकार की जाती है, जिसमें भूमि की वंदना या पूजा का भाव निहित है। उनके अनुसार, इस्लाम में अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत की अनुमति नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने इस आदेश को मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ बताया।
मुफ्ती नदवी ने यह भी कहा कि जिन शैक्षणिक संस्थानों में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किया जा रहा है, वहां से मुस्लिम अभिभावक अपने बच्चों को निकालने पर विचार करें। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे और इसे वापस ले।
अब यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस राष्ट्रीय सम्मान बनाम धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक संतुलन तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या इस विवाद का कोई सर्वमान्य समाधान निकल पाता है।







