उज्जैन विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह (अंत्यतम पवित्र स्थल) में आम श्रद्धालुओं के प्रवेश को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। यह मामला पिछले ढाई साल से चल रही वीआईपी और आम भक्तों के बीच अलग‑अलग प्रवेश व्यवस्था के विरोध में दायर याचिका के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज पर पहुंचा है।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि 4 जुलाई 2023 से आम भक्तों के लिए गर्भगृह में प्रवेश पर रोक है, जबकि प्रभावशाली लोग, नेता नेता वर्ग और वीआईपी गर्भगृह में स्वतंत्र रूप से प्रवेश कर पूजा‑अर्चना कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था संविधान के समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और धार्मिक आज़ादी (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन करती है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में मुख्य न्यायाधीश के साथ जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं, जो मंगलवार (27 जनवरी 2026) को इस विवादास्पद मामले पर सुनवाई करेंगे। याचिका में हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए फैसला जिला प्रशासन के विवेक पर छोड़ दिया था।
यह मामला धार्मिक समानता के साथ‑साथ वीआईपी कल्चर के खिलाफ एक बड़े सवाल के रूप में उभर रहा है। याचिकाकर्ता का दावा है कि गर्भगृह में प्रवेश की यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था मंदिर प्रशासन के अधिकार से परे है और इसका उद्देश्य सिर्फ रसूखदारों को ही विशेष सुविधाएँ देना है। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर आवाज उठी है: उज्जैन के सांसद ने आम भक्तों के लिए गर्भगृह खोलने की मांग की है, लेकिन प्रशासन का तर्क रहा है कि बढ़ती भीड़ और शिवलिंग क्षरण की चिंता के कारण प्रवेश सीमित रखना अनिवार्य है।
आज की सुनवाई के परिणाम से न केवल उज्जैन के भक्तों की उम्मीदें जुड़ी हैं, बल्कि धार्मिक स्थलों में समान प्रवेश व्यवस्था को लेकर देशव्यापी को भी दिशा मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह तय होगा कि क्या गर्भगृह में समान प्रवेश का अधिकार सामान्य श्रद्धालुओं को भी मिलेगा या अब भी वीआईपी व्यवस्था जारी रहेगी।







