जबलपुर… जहां सड़क नहीं, श्मशान बन गई। जहां रफ्तार नहीं, मौत दौड़ी। और जहां इंसान नहीं, एक हैवान स्टेयरिंग थामे बैठा था।
हिट एंड रन नहीं साहब, इसे सीधा-सीधा कुचल कर भाग जाना कहिए। पहले दो लाशें गिरीं, अब गिनती पांच तक पहुंच चुकी है। चैनवती बाई और लच्छो बाई तो मौके पर ही खत्म कर दी गईं, लेकिन सिस्टम की सुस्ती ने तीन और जिंदगियां धीरे-धीरे अस्पताल के बेड पर छीन लीं। गोमता बाई, वर्षा कुशराम और कृष्णा बाई… नाम याद रखिए, क्योंकि आरोपी तो अब तक “गायब” है।
रविवार दोपहर, बरेला से जबलपुर की ओर आती एक सफेद कार… तेज रफ्तार, सड़क किनारे बैठे मजदूर, और एक पल में 13 जिंदगियां हवा में उछाल दी गईं। कोई ब्रेक नहीं, कोई इंसानियत नहीं, और सबसे शर्मनाक बात कोई नंबर प्लेट नहीं।
अब सवाल पूछना जरूरी है।
बिना नंबर की कार सड़क पर कैसे दौड़ रही थी?
टोल, ट्रैफिक, पुलिस सब सो रहे थे क्या?
और आरोपी अभी तक खुलेआम कैसे घूम रहा है?
हादसे के बाद ड्राइवर ऐसे भागा जैसे कानून नाम की चीज़ इस देश में होती ही नहीं। अब क्राइम ब्रांच लगी है, एएसपी के नेतृत्व में टीमें दौड़ रही हैं, सीसीटीवी खंगाले जा रहे हैं। लेकिन सवाल वही है जब पांच लोग मर चुके हैं, तब क्यों हरकत में आया सिस्टम? यह सिर्फ एक हादसा नहीं है। यह गरीब मजदूरों की जिंदगी की कीमत पर लिखा गया सिस्टम का चार्जशीट है। और अगर आरोपी बच निकला, तो याद रखिए अगली खबर किसी और की लाशों के साथ आएगी।







