रविवार की सुबह यात्रियों के लिए सफर नहीं, बल्कि डर का इम्तिहान बन गई। गोंदिया से कटंगी आ रही लोकल मेमू यात्री ट्रेन क्रमांक 78803 में जैसे ही इंजन से धुएं का गुबार उठा, वैसे ही रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई। वारासिवनी–कटंगी रेलवे ट्रैक पर ग्राम शेरपार के पास अचानक धुआं उठता देख यात्रियों के होश उड़ गए। चंद सेकंड में “आग लग गई” की खबर पूरी ट्रेन में फैल गई और डिब्बों में चीख-पुकार मच गई।
लोको पायलट ने आनन-फानन में ट्रेन रोक तो दी, लेकिन तब तक हालात बेकाबू हो चुके थे। यात्री जान बचाने के लिए सामान उठाकर पटरी पर कूद पड़े। कोई बुजुर्ग, कोई महिला, कोई बच्चा अफरा-तफरी का ऐसा नजारा मानो हादसा हो ही गया हो। बाद में रेलवे ने सफाई दी कि इंजन के एक वाल में शॉर्ट सर्किट हुआ था, आग नहीं लगी। सवाल यह है कि अगर आग नहीं लगी थी, तो धुआं क्यों उठा? और अगर तकनीकी खराबी थी, तो यात्रियों की जान जोखिम में क्यों डाली गई?
रेलवे के दावों के बीच हकीकत यह रही कि ट्रेन करीब 20 मिनट तक शेरपार चौकी के पास खड़ी रही। अग्निशामक यंत्र से शॉर्ट सर्किट पर काबू पाने की बात कही गई, लेकिन डर के साए में खड़े यात्रियों के लिए यह “तकनीकी खराबी” किसी बड़े हादसे से कम नहीं थी। सुधार के बाद ट्रेन किसी तरह कटंगी स्टेशन पहुंची, लेकिन कई यात्री दोबारा ट्रेन में चढ़ने से कतराते रहे।
यह वही रेलवे है जो सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन एक मामूली शॉर्ट सर्किट पूरे सिस्टम की कमजोर नस दिखा गया। गनीमत रही कि आग नहीं लगी, वरना जिम्मेदारी कौन लेता? सवाल सिर्फ धुएं का नहीं, भरोसे का है और वह इस घटना के साथ पटरी पर ही दम तोड़ता नजर आया।







