भागीरथपुरा में यह कोई हादसा नहीं, यह सरकारी लापरवाही से रची गई सामूहिक हत्या है। आज फिर 24वीं मौत की पुष्टि हुई, एक बार फिर सिस्टम की रीढ़ की हड्डी दिखाई दे गई खोखली, बेदम और शर्म से खाली।
यह ज़हरीला पानी सिर्फ नलों से नहीं बह रहा, यह प्रशासन के झूठे दावों, फाइलों में दबे नोट्स और जिम्मेदार अफसरों की चुप्पी से बह रहा है। मौतों का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, और अफसर अब भी “स्थिति नियंत्रण में है” का रटा-रटाया बयान दोहराने में व्यस्त हैं।
एमवाय अस्पताल में हालात किसी युद्धक्षेत्र से कम नहीं। दर्जनों मरीज अब भी भर्ती हैं, कई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। वेंटिलेटर पर पड़ी सांसें सवाल पूछ रही हैं अगर पानी साफ था, तो ये लोग यहां क्यों हैं? डॉक्टरों की टीमें जूझ रही हैं, लेकिन उन्हें भी पता है कि जब तक ज़हर की सप्लाई बंद नहीं होगी, तब तक यह लड़ाई अधूरी है।
भागीरथपुरा की गलियों में आज मातम और गुस्सा साथ-साथ चल रहे हैं। लोग डरे नहीं हैं, लोग उबल रहे हैं। हर घर से एक ही आवाज़ उठ रही है
“साफ पानी की जिम्मेदारी किसकी है?” और उससे भी बड़ा सवाल “क्या गरीब की जान की कोई कीमत नहीं?”
प्रशासन कैमरों के सामने आश्वासन बांट रहा है, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई यह है कि लोग अब भी वही पानी पीने को मजबूर हैं, जो उन्हें कब्र तक पहुंचा रहा है। भागीरथपुरा आज कोई इलाका नहीं, यह एक चेतावनी है। और इस चेतावनी के अंत में सिर्फ एक सवाल बचता है, 24 के बाद… अगला नंबर किसका?







