वाराणसी… मोक्ष की नगरी… जहां मृत्यु भी उत्सव है। लेकिन आज उसी मणिकर्णिका घाट पर सवालों की चिता जल रही है।
विश्वप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट का एक हिस्सा तोड़ा जा रहा है, और उसी मलबे में दबती दिख रही है लोगों की आस्था!
घाट पर स्थापित मूर्तियों में टूट-फूट की खबर सामने आते ही हड़कंप मच गया। देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंतराव होलकर तृतीय खुद मौके पर पहुंचे। उन्होंने सिर्फ देखा नहीं पूजा की, और मूर्तियों को सफेद कपड़े से ढंक दिया, ताकि आगे कोई चोट न पहुंचे। सवाल साफ है
अगर सब सुरक्षित था, तो ढंकने की जरूरत क्यों पड़ी?
होलकर ने निगमायुक्त, संभागायुक्त और अफसरों से दो टूक कहा “क्षतिग्रस्त मूर्तियां हमें सौंप दीजिए, हम इन्हें फिर से स्थापित करेंगे। आस्था कोई कंक्रीट नहीं, जिसे तोड़कर दोबारा ढाल दिया जाए।” लेकिन यहीं से शुरू होता है प्रशासन का बचाव, या कहें पलटवार।
कलेक्टर सत्येंद्र कहते हैं, “मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। सब सुरक्षित है। AI से फर्जी वीडियो फैलाए जा रहे हैं।
मणिकर्णिका घाट जहां हर साल लाखों लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं, जहां जगह की कमी है, सफाई चुनौती है, पर क्या विकास के नाम पर संवेदनाएं कुचल दी जाएंगी? क्या परियोजनाओं की आड़ में इतिहास को हथौड़े से जवाब मिलेगा?
प्रशासन कहता है, निर्माण के बाद मूर्तियां उसी स्थान पर लगेंगी। कलाकृतियां संरक्षित हैं। भ्रम फैलाने वालों पर कार्रवाई होगी। लेकिन जनता पूछ रही है, भ्रम कौन फैला रहा है? जो देख रहा है, या जो नकार रहा है? मणिकर्णिका सिर्फ एक घाट नहीं वो विश्वास है, परंपरा है, और चेतावनी भी।
याद रखिए, यहां चिताएं जलती हैं, और जब आस्था जले… तो सवाल राख नहीं होते।







