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“पीएसएलवी की उड़ान में दरार | क्या भारत का भरोसेमंद रॉकेट चूक गया?”

 

18 मई 2025 की सुबह… श्रीहरिकोटा का आसमान शांत था, कंट्रोल रूम में वैज्ञानिकों की आंखें स्क्रीन पर टिकी थीं और देश को एक और सफल मिशन की उम्मीद थी। लेकिन कुछ ही मिनटों में यह उम्मीद सवालों में बदल गई। भारत के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले रॉकेट पीएसएलवी का यह तीसरा असफल प्रक्षेपण बन गया। तीसरे चरण में आई तकनीकी गड़बड़ी ने मिशन को बीच रास्ते ही रोक दिया और अब पूरे देश की निगाहें इसरो की जांच पर टिकी हैं।

लॉन्च के शुरुआती दो चरण बिल्कुल सामान्य रहे। रॉकेट ने तय गति पकड़ी, पृथ्वी के वायुमंडल को पार किया और सब कुछ नियंत्रण में दिख रहा था। लेकिन जैसे ही तीसरे चरण की बारी आई, टेलीमेट्री डेटा में असामान्य संकेत मिलने लगे। कुछ ही क्षणों में मिशन कंट्रोल ने वह शब्द सुना, जिससे हर वैज्ञानिक डरता है— “मिशन डिविएशन।”

प्राथमिक जांच में सामने आया कि तीसरे चरण में केव्लार कवर के फटने की आशंका है। केव्लार, जो अपनी मजबूती और हल्केपन के लिए जाना जाता है, उसी ने इस बार सवाल खड़े कर दिए। इसके साथ ही फ्लेक्स नोजल की कार्यप्रणाली में भी गड़बड़ी की संभावना जताई जा रही है। फ्लेक्स नोजल रॉकेट को दिशा देने में अहम भूमिका निभाता है, और इसमें आई जरा-सी खराबी भी पूरे मिशन की दिशा बदल सकती है।

यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि पीएसएलवी को इसरो का वर्कहॉर्स कहा जाता है। दशकों से यह रॉकेट भारत के छोटे और मध्यम उपग्रहों को अंतरिक्ष तक पहुंचाता आया है। अब तक इसकी सफलता दर 94.44% रही है, जो वैश्विक स्तर पर बेहद प्रभावशाली मानी जाती है। लेकिन यह असफलता याद दिलाती है कि अंतरिक्ष विज्ञान में पूर्णता जैसी कोई चीज़ नहीं होती—यहां हर उड़ान एक नई परीक्षा होती है।

अगर इसरो के पूरे इतिहास पर नज़र डालें तो अब तक 97 लॉन्च में 86.08% मिशन सफल रहे हैं। ये आंकड़े भारत की तकनीकी क्षमता और वैज्ञानिक अनुशासन को दर्शाते हैं। लेकिन हर असफलता अपने साथ सवाल और सीख लेकर आती है। यही वजह है कि इसरो ने तुरंत स्वतंत्र जांच समिति गठित कर दी है, जो केव्लार कवर, फ्लेक्स नोजल और तीसरे चरण की डिजाइन तक हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है।

अब सवाल यह है, क्या यह असफलता भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को धीमा करेगी? विशेषज्ञों की मानें तो जवाब है नहीं। आने वाले मिशनों में अतिरिक्त सावधानियां बरती जाएंगी, डिजाइन में सुधार होगा और पीएसएलवी फिर उसी भरोसे के साथ लौटेगा, जिसके लिए वह जाना जाता है।

 

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