भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई कथित 16 मौतों का मामला अब और अधिक उलझता और रहस्यमय होता जा रहा है। शुरुआती दिनों में जिस घटना ने पूरे शहर और प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था, अब वही मामला आंकड़ों, दस्तावेजों और प्रमाणों की कमी के कारण गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि शासन की ओर से हाईकोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में दूषित पानी से सिर्फ 4 मौतों का ही स्पष्ट उल्लेख किया गया है। ऐसे में शेष 12 लोगों की मौतों को लेकर न तो कोई ठोस चिकित्सकीय प्रमाण सामने आ पाया है और न ही प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट जवाब।
स्थिति इसलिए और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि जानकारी सामने आई है कि कई मृतकों का पोस्टमॉर्टम तक नहीं कराया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के यह प्रमाणित करना लगभग असंभव हो जाता है कि मौत का वास्तविक कारण दूषित पानी था या कोई अन्य बीमारी।
भागीरथपुरा में जिस तरह से एक ही समयावधि में बड़ी संख्या में लोगों की तबीयत बिगड़ी और मौतें हुईं, उससे प्रारंभिक तौर पर दूषित जल की आशंका प्रबल मानी गई थी। लेकिन अब जब मामला न्यायालय तक पहुंचा है, तो सबूतों की कमी शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई है।
कानूनविदों का स्पष्ट मत है कि मुआवजा देने के लिए कारण-ए-मौत का ठोस चिकित्सकीय प्रमाण आवश्यक होता है। यदि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट या मेडिकल रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं, तो शासन के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर किस आधार पर मुआवजा तय किया जाएगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का भी कहना है कि दूषित पानी से होने वाली बीमारियों में कई बार लक्षण समान होते हैं, लेकिन मृत्यु के सटीक कारण की पुष्टि केवल चिकित्सकीय परीक्षण से ही संभव है। ऐसे में जिन मामलों में पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, वहां मौत को दूषित पानी से जोड़ना कानूनी और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से कमजोर माना जाएगा।
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ प्रणाली की गंभीर खामियों को भी उजागर कर दिया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब हालात इतने गंभीर थे, तब समय रहते पोस्टमॉर्टम और दस्तावेजी प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं की गई।
अब स्थिति यह है कि एक ओर पीड़ित परिवार न्याय और मुआवजे की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर शासन कानूनी पेंचों और प्रमाणों की कमी में उलझा नजर आ रहा है। हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट ने जहां कई सवालों के जवाब दिए हैं, वहीं उससे कहीं अधिक नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
भागीरथपुरा की यह त्रासदी अब सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक प्रमाणों की कसौटी बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि शासन इन 12 मौतों को लेकर क्या रुख अपनाता है और पीड़ित परिवारों को न्याय कैसे मिलता है।







