मध्य प्रदेश के उमरिया पुलिस ट्रेनिंग स्कूल यानी PTS में पदस्थ सब इंस्पेक्टर अमिताभ प्रताप सिंह को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने उनके गोंड जाति के प्रमाण पत्र को अमान्य कर दिया है। समिति के इस फैसले के बाद सरकारी नौकरी में कथित तौर पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के इस्तेमाल का मामला फिर चर्चा में आ गया है।
दरअसल, अमिताभ प्रताप सिंह का पूर्व नाम अमिताभ थियोफिलिस बताया गया है। शिकायत में उनके जाति प्रमाण पत्र और पुराने रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए गए थे। मामले की जांच के दौरान जबलपुर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट के साथ-साथ स्कूल और चर्च से जुड़े रिकॉर्ड तथा शिकायतकर्ता प्रमिला तिवारी उपाध्याय की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों की भी जांच की गई।
जांच में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, शुरुआती शैक्षणिक रिकॉर्ड में अलग पहचान दर्ज होने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक आठवीं कक्षा तक के रिकॉर्ड में उन्हें ‘क्रिश्चियन’ दर्ज किया गया था, जबकि बाद के रिकॉर्ड में उनके हिंदू होने की जानकारी सामने आई। इसी बदलाव और जाति प्रमाण पत्र से जुड़े दस्तावेजों को समिति ने जांच के दायरे में रखा।
मामले में एक अहम बिंदु जबलपुर एसडीएम कार्यालय के रिकॉर्ड से जुड़ा है। समिति के सामने पेश दस्तावेजों के मुताबिक, अमिताभ प्रताप सिंह ने जबलपुर के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कार्यालय से जारी जाति प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल किया था। लेकिन वर्ष 1997-98 के दायरा पंजी की जांच में प्रकरण क्रमांक 6745/बी-121/1997-98 का कोई रिकॉर्ड सरकारी रजिस्टर में नहीं मिला।
इसके अलावा, एसडीएम कार्यालय गोरखपुर, जबलपुर से जारी डिजिटल जाति प्रमाण पत्र भी पहले ही निरस्त किया जा चुका था। जांच में इस प्रमाण पत्र को लेकर भी कई अनियमितताएं सामने आने की बात कही गई है।
अब राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति के फैसले के बाद गोंड जाति प्रमाण पत्र को अमान्य माना गया है। यह मामला सिर्फ एक अधिकारी के दस्तावेजों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सेवाओं में आरक्षण और जाति प्रमाण पत्र की सत्यता की जांच से भी जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। फिलहाल समिति के फैसले के बाद आगे की प्रशासनिक कार्रवाई क्या होगी, इस पर भी नजर बनी हुई है।





