मध्यप्रदेश में ग्रामीणों को संपत्ति का मालिकाना हक दिलाने वाली स्वामित्व योजना को लेकर अब पटवारी संघ और सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। योजना के तहत 50 लाख से ज्यादा ग्रामीण संपत्तियों की निशुल्क रजिस्ट्री कराने की तैयारी है, लेकिन पटवारी संघ ने रजिस्ट्री के निष्पादक यानी एग्जीक्यूटर की भूमिका निभाने से इनकार कर दिया है।
पटवारी संघ का कहना है कि रजिस्ट्री और डीड में पटवारी का नाम निष्पादक के तौर पर शामिल होने से भविष्य में जमीन या संपत्ति को लेकर कोई विवाद खड़ा हुआ, तो पटवारियों को भी कानूनी कार्रवाई और सिविल कोर्ट के मामलों का सामना करना पड़ सकता है।
पटवारी संघ के पदाधिकारियों के मुताबिक, उनका विरोध योजना के खिलाफ नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही को लेकर है। संघ चाहता है कि पटवारियों की भूमिका सिर्फ रिकॉर्ड और राजस्व संबंधी सहयोग तक सीमित रखी जाए और रजिस्ट्री के निष्पादन की जिम्मेदारी किसी सक्षम अधिकारी को दी जाए।
दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार ने स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण आबादी की संपत्तियों की रजिस्ट्री निशुल्क कराने का फैसला किया है। इसके लिए सरकार ने स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क में छूट का प्रावधान किया है। योजना के तहत 50 लाख से अधिक संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने का लक्ष्य रखा गया है।
लेकिन रजिस्ट्री प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही पटवारियों की आपत्ति सामने आ गई। संघ का कहना है कि सिर्फ मौखिक आश्वासन से उनकी कानूनी चिंता दूर नहीं होगी। उन्हें लिखित तौर पर स्पष्ट सुरक्षा और जिम्मेदारी तय किए जाने की जरूरत है। ताजा स्थिति में पटवारी संघ ने निष्पादक की भूमिका से हटाए जाने तक असहयोग जारी रखने की बात कही है।
अब बड़ा सवाल यही है कि सरकार पटवारियों की कानूनी चिंताओं का समाधान कैसे करती है और निशुल्क रजिस्ट्री की प्रक्रिया को किस व्यवस्था के तहत आगे बढ़ाया जाता है। क्योंकि एक तरफ लाखों ग्रामीणों को अपनी संपत्ति का मजबूत कानूनी दस्तावेज देने का लक्ष्य है, वहीं दूसरी तरफ जिम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर कर्मचारियों की आपत्ति सामने आ गई है। आने वाले दिनों में सरकार और पटवारी संघ के बीच होने वाली बातचीत से ही इस पूरे विवाद की अगली तस्वीर साफ होगी।




