प्रयागराज माघ मेला… आस्था का महासंगम या लापरवाही का खुला मैदान?
बुधवार शाम ब्रह्माश्रम शिविर में अचानक आग भड़क उठी। आग ऐसी कि लपटें आसमान को चीरती रहीं और धुएं का गुबार 5 किलोमीटर दूर तक दिखाई दिया। सवाल सीधा है जब पूरा शहर देख रहा था, तब ज़िम्मेदार क्या कर रहे थे?
सेक्टर-4 के लोअर मार्ग में आग ने देखते ही देखते दो बड़े शिविरों के अंदर बने 10 से ज्यादा टेंट निगल लिए। अफरा-तफरी मच गई, श्रद्धालु इधर-उधर भागने लगे। पूरा इलाका सील किया गया लेकिन आग लगने के बाद! क्या इंतज़ाम सिर्फ आग लगने के बाद ही जागते हैं? 10 फायर ब्रिगेड, 10 एंबुलेंस और 30 दमकलकर्मी मौके पर उतरे। पुलिस और संतों ने मिलकर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया। राहत की बात ये रही कि बड़ा जान-माल का नुकसान टल गया लेकिन क्या यही हर बार की किस्मत होगी?
अब ज़रा ध्यान दीजिए…
सिर्फ 24 घंटे पहले, मंगलवार शाम सेक्टर-5 के नारायण शुक्ला धाम शिविर में भी आग लगी थी।
नतीजा?
➡️ 15 टेंट खाक
➡️ 20 दुकानें राख
➡️ एक कल्पवासी झुलसा
तब कहा गया शॉर्ट सर्किट!
आज फिर आग…
तो सवाल उठता है
क्या ये सिर्फ “शॉर्ट सर्किट” है या सिस्टम की सोच ही शॉर्ट हो चुकी है?
डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद आग बुझा दी गई, लेकिन जवाबदेही की आग अभी भी धधक रही है। लाखों श्रद्धालुओं के बीच, अस्थायी टेंटों में बिजली, गैस और सुरक्षा के इंतज़ाम आखिर किस भरोसे पर छोड़े गए हैं? माघ मेला श्रद्धा का पर्व है, प्रयोगशाला नहीं! हर बार आग लगे, टेंट जले, लोग झुलसें और फिर वही रटी-रटाई सफाई?
अब सवाल नहीं, जवाब चाहिए।
क्योंकि अगली चिंगारी… अगली खबर को और भयानक बना सकती है।







