उज्जैन में एक बार फिर वही हुआ, जिसका डर हर जिम्मेदार अफसर को होना चाहिए था लेकिन उन्हें फर्क ही नहीं पड़ा। चाइना डोर… हां वही जानलेवा डोर, जिस पर पाबंदी सिर्फ कागजों में है, हकीकत में नहीं।
आज इस लापरवाही की कीमत एक युवक ने अपने गले से चुकाई।
तेज रफ्तार बाइक, सड़क पर चलता युवक… और अचानक हवा में तनी चाइना डोर। पल भर में गला कट गया। खून फव्वारे की तरह बहा। युवक तड़पता रहा, चीखता रहा। 20 टांके लगे हैं, हालत नाजुक है और अभी ICU में जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहा है। सवाल साफ है—अगर कुछ और सेकेंड लग जाते, तो क्या लाश उठानी पड़ती?
और यह सिर्फ एक मामला नहीं है। इसी हादसे में एक और व्यक्ति की नाक कट गई। चेहरा खून से लथपथ, दर्द से कराहता इंसान… लेकिन प्रशासन? हमेशा की तरह खामोश। हर साल यही ड्रामा। हादसे, खून, बयानबाज़ी और फिर सब ठंडा। प्रतिबंध है तो चाइना डोर बिक कैसे रही है? उड़ कौन रहा है? पुलिस की आंखें बंद क्यों हैं? या फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
उज्जैन पूछ रहा है क्या अगली बारी किसी की जान की होगी?
और प्रशासन को शायद तब भी फर्क नहीं पड़ेगा।







