कॉर्पोरेट जगत से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी कंपनी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही सिर्फ इस आधार पर खत्म नहीं की जा सकती कि कथित अपराध करने वाले कर्मचारी या अधिकारी की पहचान नहीं हो पाई या उसे आरोपी नहीं बनाया गया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला दवा कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील पर सुनाया है। कोर्ट ने कंपनी की अपील खारिज करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कंपनी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने से इनकार किया गया था।
दरअसल, सनोफी इंडिया के खिलाफ CBI ने आपराधिक मामला दर्ज किया था। कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि जिस कर्मचारी या अधिकारी के माध्यम से कथित अपराध हुआ, उसे आरोपी नहीं बनाया गया है। ऐसे में कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि किसी कंपनी की आपराधिक जिम्मेदारी केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसके भीतर अपराध के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान हुई है या नहीं।
इस फैसले का कॉर्पोरेट कंपनियों पर सीधा असर पड़ सकता है। इसका मतलब है कि कंपनी के खिलाफ मामला केवल इसलिए समाप्त नहीं होगा कि संबंधित कर्मचारी या अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से मुकदमा नहीं चल रहा है।
हालांकि, यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। कंपनी एक कानूनी इकाई है, इसलिए उसके लिए जेल की सजा संभव नहीं होती। अगर कानून के तहत अपराध साबित होता है, तो कंपनी पर जुर्माना या अन्य वैधानिक दंड लगाया जा सकता है।
यानी सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कंपनी के भीतर जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान न होने को कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रोकने का स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला कॉर्पोरेट जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




