इंदौर जिले में वर्ष 2026–27 के लिए शराब दुकानों के आवंटन की ई-टेंडर-कम-ऑक्शन प्रक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर शराब कारोबार में इतना बड़ा पैसा आता कहां से है और जाता कहां है। 05 और 06 मार्च 2026 को संपन्न हुई इस प्रक्रिया के पहले चरण, बैच-02 में कुल 19 समूहों में से केवल 12 समूहों के लिए ही ई-टेंडर और ऑक्शन कराया गया, लेकिन जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने पूरे सिस्टम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इन 12 समूहों का वर्ष 2025-26 का परिगणित वार्षिक आधार मूल्य 325.86 करोड़ रुपये था। सरकार ने 2026-27 के लिए इनका आरक्षित मूल्य 391.03 करोड़ रुपये तय किया था। लेकिन जब बोली की असली जंग शुरू हुई तो शराब कारोबारियों ने मानो पैसों की बारिश कर दी। ई-टेंडर और ऑक्शन के जरिए इन समूहों के लिए कुल 448.20 करोड़ रुपये का उच्चतम ऑफर सामने आया।
यानि पिछले साल के वार्षिक मूल्य से करीब 37.54 प्रतिशत ज्यादा और सरकार के तय आरक्षित मूल्य से भी लगभग 14.62 प्रतिशत अधिक। कागजों में इसे सरकार की बड़ी कमाई बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि अगर ठेकेदार इतने ऊंचे दाम देकर दुकानें ले रहे हैं तो आखिरकार इसकी कीमत कौन चुकाएगा? क्या यह बोझ आखिरकार आम लोगों की जेब पर नहीं पड़ेगा?
प्रक्रिया के दौरान कई समूहों में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। बोली दर बोली चढ़ती गई और आंकड़े करोड़ों से आगे निकलते गए। प्रशासन इसे प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया का नतीजा बताकर राजस्व बढ़ने की बात कह रहा है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि शराब के कारोबार में जितना बड़ा पैसा घूम रहा है, उतने ही बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
अब देखना यह है कि यह बढ़ा हुआ राजस्व जनता के विकास में कितना नजर आएगा और कितना सिर्फ फाइलों और आंकड़ों में ही चमकता रहेगा। क्योंकि इतिहास गवाह है, शराब के ठेकों की बोली चाहे जितनी ऊंची लगे, आखिरकार उसका असर सड़कों से लेकर समाज तक कहीं न कहीं जरूर दिखाई देता है।







