
“प्रत्येक घर पहुंचेगा जल, जब खिलेगा कमल।”
इंदौर। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो इन दिनों सत्ता के लिए सबसे असहज सवाल बन गया है। वीडियो में भागीरथपुरा की एक तंग गली, दीवार पर टंगा एक बोर्ड और उस पर लिखा एक चुनावी जुमला
कभी तालियों और नारों के बीच गूंजने वाला यह वादा आज एक कड़वे व्यंग्य में बदल चुका है। जिस इलाके में दूषित पानी के कारण अब तक 23 लोगों की जान जा चुकी है, वहीं यह बोर्ड खड़ा होकर पूरे सिस्टम की पोल खोल रहा है।
यह सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि उस भरोसे का शव है जो चुनाव के समय लोगों को दिया गया था। जिस पानी के नाम पर वोट मांगे गए, उसी पानी ने मातम लिख दिया। भागीरथपुरा की गलियों में अब विकास के दावे नहीं, बल्कि चीखें, आंसू और गुस्सा बह रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस त्रासदी के बाद भी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नजर नहीं आता। पार्षद हों या विधायक—सबकी जुबान पर ताला लगा है। कभी काफिलों में घूमने वाले नेता अब बंद शीशों वाली गाड़ियों से इलाके को नापते दिखते हैं, लेकिन किसी में इतना साहस नहीं कि उतरकर पीड़ित परिवारों की आंखों में आंख डालकर बात कर सके।
वायरल वीडियो में दिख रहा बोर्ड आज प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुका है। चुनाव बीत गए, कमल खिला, लेकिन “प्रत्येक घर जल” का सपना न सिर्फ अधूरा रहा, बल्कि वही पानी लोगों की मौत का कारण बन गया। यह घटना साबित करती है कि नारे पोस्टरों तक जिंदा रहते हैं, जमीन पर उनकी कोई उम्र नहीं होती।
आज भागीरथपुरा के रहवासी इस वीडियो के जरिए सवाल पूछ रहे हैं
क्या जनता सिर्फ चुनाव के वक्त याद आती है?
क्या मौतों के बाद भी जवाबदेही तय नहीं होगी?
और क्या अगला चुनाव आने तक फिर नए जुमलों की स्क्रिप्ट तैयार की जाएगी?
भागीरथपुरा की गलियों में अब सिर्फ मातम नहीं, बल्कि एक चेतावनी गूंज रही है। यह वीडियो सत्ता के लिए आईना है—जिसमें साफ दिख रहा है कि विकास के दावे कितने खोखले थे। सवाल अब सिर्फ पानी का नहीं, भरोसे का है… और इस बार जनता जवाब चाहती है, सिर्फ जुमला नहीं।







