मध्य प्रदेश में हर घर तक साफ और सुरक्षित पानी पहुंचाने के लिए अमृत 2.0 योजना के तहत बड़े स्तर पर वाटर ट्रीटमेंट प्लांट तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन अब इन प्लांट्स में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 12 हजार करोड़ रुपये की इस योजना के तहत बनाए जा रहे 622 वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में SCADA सिस्टम के लिए अप्रूव्ड ब्रांड के बजाय कुछ जगहों पर कथित तौर पर सस्ते लोकल सेंसर और उपकरण लगाए गए।
SCADA यानी सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डाटा एक्वीजिशन सिस्टम, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का एक अहम हिस्सा होता है। इसके जरिए पानी की गुणवत्ता, टैंक का स्तर, पंपिंग और सप्लाई जैसी प्रक्रियाओं की ऑटोमैटिक निगरानी की जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, नियमों में निर्धारित ब्रांड के उपकरण लगाए जाने थे, लेकिन जांच के दौरान कुछ प्लांट्स में अलग कंपनियों के लोकल उपकरण मिलने का दावा किया गया। खास बात यह बताई गई कि इन उपकरणों पर महंगी और अप्रूव्ड कंपनियों के स्टीकर लगाए गए थे। स्टीकर हटाने के बाद उपकरणों की वास्तविक पहचान सामने आने का दावा किया गया।
इस मामले में PDMC और संबंधित इंजीनियर्स की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि आरोप है कि इन उपकरणों को जांच के बाद पास किया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर नियमों के मुताबिक ब्रांडेड उपकरणों की जगह लोकल उपकरण लगाए गए हैं, तो उनकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता की जांच किस स्तर पर हुई? क्या सरकारी राशि का सही इस्तेमाल हुआ और क्या पानी की गुणवत्ता की निगरानी व्यवस्था से किसी तरह का समझौता हुआ?
फिलहाल इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक जांच से ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी। अमृत योजना का उद्देश्य लोगों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है, ऐसे में उपकरणों की गुणवत्ता और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।







