मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत हजारों परिवारों ने अपने घरों की छत पर सोलर पैनल लगवाए। मकसद था खुद बिजली बनाना, अतिरिक्त बिजली ग्रिड को देना और बिजली के भारी बिल से राहत पाना। लेकिन अब कई उपभोक्ताओं के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है जब घर की बिजली सोलर से बन रही है, तो हर महीने ₹800 से ₹1,000 तक का बिल क्यों आ रहा है?
दरअसल, सोलर पैनल बिजली की खपत का खर्च कम कर सकते हैं, लेकिन बिजली कनेक्शन से जुड़े फिक्स्ड चार्ज खत्म नहीं होते। यही चार्ज अब उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का कारण बन रहा है।
दावा है कि मध्य प्रदेश में करीब 1 लाख 37 हजार से ज्यादा सोलर उपभोक्ताओं से फिक्स्ड चार्ज वसूला जा रहा है। इस हिसाब से इन परिवारों पर हर महीने लगभग 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने की बात सामने आई है।
मामला विधानसभा तक पहुंच चुका है। सरकार की ओर से कहा गया है कि फिक्स्ड चार्ज की वसूली विद्युत नियामक आयोग द्वारा तय नियमों के तहत की जाती है। यानी सोलर से बिजली पैदा करने के बावजूद उपभोक्ता को कनेक्शन बनाए रखने से जुड़े निर्धारित शुल्क का भुगतान करना पड़ता है।
अब सवाल सिर्फ बिल का नहीं, बल्कि सोलर योजना के उद्देश्य का भी है। अगर उपभोक्ता बिजली पैदा करके ग्रिड को दे रहा है, तो क्या उस पर इतना फिक्स्ड चार्ज उचित है? सोलर लगाने वाले परिवारों को वास्तविक राहत कितनी मिल रही है और नियमों में बदलाव की जरूरत है या नहीं इस पर बहस तेज हो गई है।
यानी सोलर पैनल से बिजली का खर्च भले कम हो जाए, लेकिन जब तक फिक्स्ड चार्ज लागू है, तब तक बिजली का बिल पूरी तरह शून्य होना जरूरी नहीं है।







