राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में आज सन्नाटा भी कांप उठा। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से आई बाघिन ने जैसे ही मुकुंदरा की ज़मीन पर कदम रखा, जंगल की हवा का रुख बदल गया। यह कोई साधारण ट्रांसफर नहीं… यह एक चेतावनी है।
सूत्रों के मुताबिक, विशेष मॉनिटरिंग टीम की कड़ी निगरानी में बाघिन को यहां लाया गया। लेकिन सवाल ये है क्या मुकुंदरा तैयार है उस आग के लिए, जो बांधवगढ़ की धरती से उठकर यहां पहुंची है?
वन विभाग इसे “संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम” बता रहा है। मगर हकीकत ये है कि मुकुंदरा वर्षों से बाघों की कमी और असफल पुनर्वास की कहानी ढोता रहा है। अब एक अकेली बाघिन से उम्मीदों का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है।
यह वही मुकुंदरा है, जहां पहले भी बाघ लाए गए… योजनाएं बनीं… दावे किए गए… और फिर चुप्पी छा गई। क्या इस बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा? या फिर यह बाघिन प्रशासन की सुस्ती को चीरती हुई नया अध्याय लिखेगी?
जंगल में हर हलचल पर कैमरे तैनात हैं, ड्रोन उड़ रहे हैं, और अफसरों के चेहरे पर तनाव साफ झलक रहा है। क्योंकि यह सिर्फ एक बाघिन नहीं… यह परीक्षा है।
अगर यह प्रयोग असफल हुआ, तो सवाल सीधे उन फैसलों पर उठेंगे, जिन्होंने वर्षों से मुकुंदरा को सिर्फ कागज़ों पर जिंदा रखा है। और अगर सफल हुआ — तो यह बाघिन उन सबको करारा जवाब होगी, जो कहते थे कि मुकुंदरा कभी दहाड़ नहीं सकता।
अब निगाहें टिकी हैं… सांसें थमी हैं… और मुकुंदरा इंतजार में है क्या यह दहाड़ उम्मीद बनेगी या फिर एक और सन्नाटा?







