शहर की फिज़ा आज अचानक बदल गई, जब हिंदू संगठनों का एक बड़ा जत्था मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने के लिए सड़कों पर उतर आया। हाथों में झंडे, नारों में आक्रोश और चेहरों पर दृढ़ संकल्प काफिला जैसे-जैसे आगे बढ़ा, प्रशासन की धड़कनें तेज़ होती गईं।
मुख्यमंत्री आवास से कुछ ही दूरी पर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रास्ता रोक दिया। हालात नाज़ुक थे। एक ओर सुरक्षा का सख़्त घेरा, दूसरी ओर बढ़ता जनसैलाब। कुछ पल ऐसे लगे मानो टकराव तय हो लेकिन तभी माहौल ने करवट ली।
अचानक नारों की जगह हनुमान चालीसा की पंक्तियाँ गूंजने लगीं। सड़क श्रद्धा से भर उठी। कार्यकर्ता शांत स्वर में पाठ करने लगे, हाथ जुड़े, आंखें बंद—और तनाव में डूबी भीड़ एक अनुशासित सभा में बदल गई। पुलिस भी सतर्क रही, लेकिन हालात नियंत्रण में दिखे।
प्रशासन और संगठन प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का दौर चला। देर तक चले संवाद के बाद प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी और चेतावनी के साथ पीछे हटने का फैसला लिया।
आज की यह तस्वीर कई सवाल छोड़ गई क्या आस्था की आवाज़ ने टकराव को टाल दिया? क्या संवाद की यह राह आगे भी खुलेगी? फिलहाल, शहर ने राहत की सांस ली है, लेकिन सियासी तापमान अब भी जस का तस है।







