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वर्दी का दर्द महाकाल के दरबार तक पहुँचा, सवाल बना व्यवस्था पर

हमारी वर्दी आज अपमान से झुकी हुई है…
और हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे यह कहें कि उनके पिता गुलाम थे।

ये शब्द किसी आंदोलनकारी नेता के नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश पुलिस के उन सिपाही-हवलदारों के हैं, जिन्होंने इंसाफ की आख़िरी उम्मीद लेकर भगवान महाकाल के दरबार में दस्तक दी।

उज्जैन में इतिहास रचते हुए, मप्र पुलिस के ट्रेड आरक्षक कैडर के पुलिसकर्मी जिनमें कुक, नाई, धोबी, मोची और स्वीपर शामिल हैं — पहली बार खुलकर सरकारी व्यवस्था के खिलाफ सामने आए। अफसरों की ‘चाकरी’ यानी अर्दली प्रथा से त्रस्त इन जवानों ने वर्दी की पीड़ा को अर्जी बनाकर महाकाल के चरणों में रख दिया।

5500 जवानों की एक पुकार, क्या अब बदलेगा पुलिस सिस्टम

मध्य प्रदेश पुलिस में ऐसे करीब 5500 ट्रेड आरक्षक हैं, जो वर्षों से जनरल ड्यूटी कैडर में संविलियन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे पुलिस का हिस्सा होते हुए भी दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर हैं।

अपनी मांग को लेकर पुलिसकर्मियों का प्रतिनिधि मंडल उज्जैन पहुँचा और सामूहिक रूप से लिखित अर्जी महाकाल को सौंपी। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं थी, बल्कि उस सिस्टम पर गहरा सवाल था, जिसने वर्दीधारियों को भी इंसाफ के लिए भगवान के दरबार तक आने पर मजबूर कर दिया।

अब सवाल ये है
क्या सरकार इस आवाज़ को सुनेगी
या फिर वर्दी का ये दर्द यूँ ही दबा दिया जाएगा?

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