जिले के ब्यौहारी उप जेल में पदस्थ 29 वर्षीय जेल प्रहरी अभिषेक सिंह की गुरुवार तड़के सड़क हादसे में मौत हो गई। वह अपनी सुबह की शिफ्ट के लिए घर से निकले थे। जिम्मेदारी निभाने जा रहे थे… लेकिन सिस्टम ने क्या उन्हें सुरक्षित रास्ता दिया?
न्यायालय के सामने उनकी मोटरसाइकिल अचानक अनियंत्रित हुई और सड़क किनारे खड़े एक पेड़ से जा टकराई। टक्कर इतनी भीषण थी कि सिर में गंभीर चोट लगी। राहगीरों ने देखा, पुलिस को सूचना दी… लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक जवान प्रहरी सड़क पर दम तोड़ चुका था। सवाल ये है क्या सड़क की हालत ठीक थी? क्या वहां पर्याप्त रोशनी थी? क्या सुरक्षा इंतज़ाम थे? या फिर यह सिर्फ एक और “दुर्घटना” बताकर फाइल बंद कर दी जाएगी?
हर बार वही कहानी ड्यूटी पर जाते कर्मचारी, खराब सड़कें, लापरवाही और फिर मौत। आखिर कब तक? क्या एक प्रहरी की जान की कीमत सिर्फ एक पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट है?
पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर अस्पताल भिजवाया है और जांच की बात कही है। लेकिन जांच से क्या वह घर लौट आएंगे? क्या उनके परिवार को जवाब मिलेगा कि एक जवान बेटा, पति या पिता आखिर सड़क पर क्यों मर गया?
उप जेल के अधिकारी और कर्मचारी घटनास्थल पर पहुंचे। मातम पसरा रहा। लेकिन मातम से ज्यादा गुस्सा होना चाहिए उस व्यवस्था पर जो अपने ही कर्मचारियों को सुरक्षित रास्ता तक नहीं दे पा रही। एक और वर्दी खामोश हो गई। एक और परिवार उजड़ गया। और सिस्टम? वह फिर से “जांच जारी है” कहकर आगे बढ़ जाएगा।







